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पहले बजट नहीं था, अब बदला खेल और खिलाड़ियों का जीवन : कर्णम

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- सिडनी ओलंपिक 2000 की पदक विजेता बोलीं, 1993 में खिलाड़ियों को विदेश भेजने के लिए पैसों का था अभाव
- अब प्रतियोगिता शुरू होने के छह माह पहले ही तैयारी के लिए भेज दिया जाता है विदेश
जम्मू। सिडनी ओलंपिक 2000 में भारोत्तोलन में भारत के लिए पहला कांस्य पदक लाने वाली कर्णम मल्लेश्वरी शनिवार को शहर पहुंचीं। युवा सेवा और खेल निदेशालय द्वारा कन्वेंशन सेंटर में करवाए जा रहे दो दिवसीय राष्ट्रीय खेल कॉन्फ्रेंस सृजन में उन्होंने जीवन के अनछुए पहलुओं पर चर्चा करते हुए खेल के मौजूदा हालात पर प्रकाश डाला।
दिल्ली स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की कुलपति कर्णम मल्लेश्वरी ने कहा कि जब उन्होंने खेल की शुरुआत की थी तो सुविधाओं का अभाव था। 1993 में केंद्र सरकार के पास इतना बजट नहीं था कि वह खिलाड़ियों को विदेश में भेज सके। उस दौरान कोई भी खेल को गंभीरता से नहीं लेता था। बावजूद हम बेहतर प्रदर्शन करते थे क्योंकि उस समय हमारे पास सिर्फ संघर्ष और मेहनत थी और देश के लिए मेडल लाने की जिद थी।
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अचानक 2014 में सब कुछ बदल गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में खेल की दुनिया में भारत ने बुलंदियों को छुआ। आज हर एक खिलाड़ी के साथ अलग से कोच, फिजियो, डॉक्टर और मसाजर है। ट्रेनिंग के लिए विदेश जाने की सुविधा है। विदेश में प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए पांच-छह महीने पहले ही भेज दिया जाता है ताकि वहां के माहौल में ढल सकें। खेल मंत्री खुद प्रतियोगिता में मौजूद रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मिलने से मेडल की बरसात हो रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में गांव के ही चमक रहें खिलाड़ी
कणर्म ने आगे कहा कि अब जब कोई मेडल जीतकर आता है तो प्रधानमंत्री खुद उसकी पीठ थपथपाते हैं। एक खिलाड़ी और टीम के लिए इससे बड़ा और कोई सम्मान हो ही नहीं सकता है। प्रधानमंत्री के खेलो इंडिया अभियान ने गांव से शहर तक खिलाड़ियों की फौज खड़ी कर दी है। वैसे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में गांव के ही खिलाड़ी सितारा बनकर चमक रहे हैं, क्योंकि संघर्ष और समय की अहमियत वह बखूबी समझते हैं।
ओलंपिक में मेडल लाएंगे जम्मू-कश्मीर के खिलाड़ी
जम्मू-कश्मीर में बढ़ती खेल गतिविधियों के लिए एलजी मनोज सिन्हा की सराहना करते हुए कर्णम ने कहा कि यहां की प्रतिभाओं को देख पूरा विश्वास है कि भविष्य में देश के लिए ओलंपिक में दो-चार मेडल खिलाड़ी लाएंगे। यह कोई हैरान करने वाली बात नहीं होगी बल्कि इसे लेकर मैं सौ फीसदी निश्चित हूं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि जम्मू-कश्मीर में खेल के लिए बेहतर मूलभूत सुविधाएं मौजूद होंगी। हर जिले और तहसील स्तर तक स्टेडियम का होना काबिले तारीफ है। मुझे पूरा विश्वास है कि ओलंपिक में मैं जो गोल्ड मेडल छोड़ कर आई हूं उसे यहां के खिलाड़ी लाएंगे। विशेषकर लड़कियों से काफी उम्मीद है।
कॅरियर बन रहे खेल : डुल्लू
मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने कहा कि खेल अब मनोरंजन या मेडल जीतने तक ही सीमित नहीं रह गया बल्कि इससे कॅरियर भी बन रहा है। सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में बढि़या रोजगार मिल रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा युवाओं को खेलों से जुड़ने का अवसर प्रदान करना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के कोच देकर हुनर को तराशना और अच्छे खिलाड़ी आगे बढ़ाना है जोे बाद में जम्मू-कश्मीर और देश का नाम रोशन करेंगे। सम्मेलन में खेल जगत से जुड़ी 30 से अधिक हस्तियां व अन्य लोग शामिल हो रहे हैं।
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गोल्ड मेडल लाने को प्रेरित करता है राष्ट्रगान : कर्नल चौहान

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के कार्यकारी निदेशक कर्नल पीएस चौहान ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का राष्ट्रगान बजने के लिए गोल्ड मेडल जीतना जरूरी है। राष्ट्रगान ही है जो गोल्ड जीतने को प्रेरित करता है। सम्मेलन में गोल्ड मेडल जीतने के लिए ही भावी रणनीति बनाई जाएगी। किश्तवाड़ में पढ़ाई के दौरान बिताए दौर को याद करते हुए कर्नल चौहान ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के खिलाड़ियों को सबसे पहले यह तय करना होगा कि कौन सा खेल खेलेंगे? उसके बाद अपना लक्ष्य निर्धारित करें और फिर सफलता कैसे हासिल करेंगे उसे जानना होगा। अधिकारियों और कोच को चाहिए कि वह खिलाड़ियों के आने का इंतजार करने की बजाय खुद उनके पास जाए। गांवों में उनकी तलाश करें। हुनर को तराशे और विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करें।
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