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अफजल गुरु की फांसी को दो साल पूरे, कश्मीर में बंद

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संसद पर हमले के दोषी मोहम्मद अफजल गुरु की फांसी को दो साल पूरे हो गए हैं। इसके मद्देनजर आज श्रीनगर में बंद घोषित किया गया है। आतंकी संगठनों ने इस दिन को शहीदी दिवस घोषित किया है। घाटी में हंगामे की आशंका के तहत कई अलगाववादी नेताओं को हिरासत में लिया या नजरबंद किया गया है।
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इलाके में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है। पुराने शहर में नौहट्टा पुलिस थाना इलाकों, सफकदल, महाराजगंज, खानयार और रैनावाडी तथा लालचौक के मैसूमा पुलिस थाना क्षेत्र में कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लागू कर दिए गए हैं।

श्रीनगर के उपायुक्त फारुक अहमद लोन ने से कहा, ‘कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए इन इलाकों में आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत प्रतिबंध लगाए गए हैं।’
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पुलिस ने बताया कि जेकेएलएफ के अध्यक्ष मोहम्मद यासीन मलिक को कल शाम उनके मैसूमा आवास से हिरासत में लेकर कोठीबाग पुलिस थाने में रखा गया। एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘मलिक को संपूर्ण चिकित्सकीय जांच के बाद सेंट्रल जेल भेज दिया गया है।’

अफजल गुरु के शव की मांग जोर पकड़ चुकी है

हुर्रियत नेता शब्बीर अहमद शाह, मोहम्मद अशरफ सेहराई और अय्याज अकबर को नजरबंद रखा गया है ताकि वे किसी प्रकार का प्रदर्शन न करें। पुराने शहर के निवासियों ने बताया कि पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों को बडी संख्या में तैनात किया गया है।

अलगाववादी समूहों ने आज और 11 फरवरी को बंद का आह्वान किया है जिसके मद्देनजर शेष कश्मीर घाटी में आज जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। जेकेएलएफ संस्थापक मोहम्मद मकबूल भट को 11 फरवरी 1984 को और अफजल गुरु को नौ फरवरी 2013 को फांसी की सजा दी गई थी। कट्टपंथी हुर्रियत कांफ्रेंस और जेकेएलएफ ने हडताल का आह्वान किया है और दो दिन के धरने की घोषणा की है।

31 साल पहले जेकेएलएफ नामक आतंकवादी संगठन के संस्थापक सदस्य मकबूल बट को 11 फरवरी के दिन तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। कश्मीर के शहीदी कब्रिस्तान में उसके लिए कब्र लिए खोदी गई थी, लेकिन उसका शव कश्मीर में लौटाया नहीं गया था जिसकी मांग आज भी की जा रही है। मकबूल बट के साथ साथ अब अफजल गुरु के शव की भी मांग जोर पकड़ चुकी है।
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घाटी में फिर तेज हुई सियासत

अफजल गुरु और मकबूल बट को फांसी देने के बाद उसके शव को तिहाड़ जेल के भीतर ही दफना दिए गए थे। ऐसा इस डर के कारण किया गया था कि अगर उनके शव को कश्मीर घाटी में भिजवा गए तो वहां भावनाएं भड़क सकती हैं, लेकिन बावजूद इसके भावनाओं को भड़कने से रोका नहीं जा सका था।

स्थिति यह थी कि कश्मीर के लोगों की, खासकर मकबूल बट के सहयोगियों तथा जेकेएलएफ के सदस्यों की, भावनाओं को भड़कने से रोका नहीं जा सका था। 31 वर्ष पूर्व जब उसे फांसी दी गई थी तो तब कश्मीर में व्यापक स्तर पर आंदोलन हुआ था। इसके उपरांत उसे जिस दिन फांसी दी गई थी उसे शहीदी दिवस के रूप में मना कर आतंकवादियों की ओर से हड़ताल की जाती है।

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद गुलाम नबी आजाद ने भी हालही में हुए राज्यसभा चुनाव में मतदान से पहले निर्दलीय विधायक इंजीनियर राश‌िद के कहने पर माना कि, अफजल गुरू का शव कश्मीर न लाकर कांग्रेस सरकार ने गलती की थी और अंतिम समय में अफजल गुरू को उनके परिवार से मिलने की मंजूरी न देना गलत था। मामले में घाटी में फिर से सियासत तेज हो गई है।
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