जम्मू। पुरखों की जमीन-जायदाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रह गई। पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों ने परिवार के परिवार मार दिए। जो जान बचाकर जैसे-तैसे यहां पहुंचे वे सात दशकों से दर बदर हैं। इन्हें न विस्थापितों का दर्जा मिला और न ही रेफ्यूजी का। 75 साल बाद भी कई परिवार कैंपों में गुजर बसर कर रहे हैं। न नौकरी है न ही जमीन। किसी तरह गुजारा हो रहा है। ये कहना है कबाइली हमले के बाद 1947 में पाकिस्तानी कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर को छोड़ने के लिए मजबूर हुए लोगों का।
अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में पीओजेके के प्रतिनिधियों ने कहा कि संसदीय समिति की 30 लाख की सिफारिश के बावजूद सरकार ने मुआवजे के नाम पर प्रति परिवार महज साढे़ पांच लाख रुपये दिए हैं। कश्मीरी पंडितों की तर्ज पर सुविधाओं की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार पीओजेके विस्थापितों का विधानसभा एवं संसद में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे। दशकों से दरबदर भटक रहे करीब 12 लाख लोगों के मसलों के समाधान के लिए आयोग या फोरम गठित किया जाए। कार्यक्रम में अभिनंदन सिंह, शुकंतला देवी, वेद राज बाली और टोडा राम ने भी अपनी बात रखी।
हमारा दुख पंडितों से कम नहीं
23 अक्तूबर, 1947 को मुजफ्फराबाद पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया। 26 अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ। प्रशासक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की साजिश के चलते हमारी फौजों को मुजफ्फराबाद के बाहर ही रोका गया, जिसकी कीमत देश और पीओजेके के विस्थापितों को चुकानी पड़ रही है। उस समय सरकार ने सिर्फ 31 हजार लोगों को ही पंजीकृत किया। पीओजेके के लोगों का दुख कश्मीरी पंडितों से कम नहीं है। सरकार पंडितों को विस्थापित मान कर सुविधाएं देती है, लेकिन हमें नजरअंदाज करती है। संसदीय समिति के आदेश पर पीओजेके के हर परिवार के लिए 25 लाख रुपये मंजूर हुए थे, लेकिन अभी तक सिर्फ पांच लाख ही मिले हैं। शिक्षा और रोजगार में आरक्षण नहीं मिला है। कम से कम नौ सीटें पीओजेके के लोगों के लिए खोल दी जाएं तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।
- राजीव चुन्नी, पीओजेके विस्थापित
जारी की जाए शेष राशि
हम तीन दरियाओं के धरती मुजफ्फराबाद के रहने वाले थे। 75 साल से अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। रोजगार के साथ ही शिक्षा और आवासीय सुविधा नहीं है। रिकॉर्ड नहीं होने से कई लोग केंद्रीय योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। पाकिस्तान प्रायोजित कबाइलियों और कश्मीरी राजनेताओं की साजिश का दंश झेल रहे हैं। सरकार पीओजेके के लिए आरक्षित 24 सीटों को खोलकर प्रतिनिधित्व दे, ताकि समस्याओं को उजागर कर सकें। सरकार ने प्रति परिवार 25 लाख रुपये देने की बात कही थी, लेकिन अभी तक सिर्फ पांच लाख ही मिले हैं। सरकार से मांग की अन्य राशि भी जारी की जाए।
- जोरावर सिंह, पीओजेके विस्थापित
सरकार हमारी स्थिति पर दे ध्यान
1947 का वह मंजर कभी नहीं भूल सकते हैं। परिजनों की हत्या के बाद सुरक्षित और बेहतर जीवन की आस में जम्मू पहुंचे थे। लेकिन यहां भी हमें गरीबी और अनदेखी के अलावा कुछ नहीं मिला। आज लोग कहते हैं कि 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ नरसंहार हुआ, लेकिन मानव इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार में पीओजेके में हमारे साथ हुआ है। सरकार तो हमें विस्थापित भी नहीं मानती है। हमारी आर्थिक स्थिति खराब है। सरकार समस्याओं पर ध्यान दे।
- जगजीत सिंह, पीओजेके विस्थापित
बोर्ड का किया जाए गठन
1947 के बाद से सरकारों ने हमारी अनदेखी की है। 2018 में केंद्र सरकार ने प्रति परिवार 25 लाख देने की बात कही थी, लेकिन चार साल में सिर्फ पांच लाख रुपये ही मिल पाए हैं। पीओजेके से आए लोग पुश्तैनी समृद्ध थे, लेकिन यहां पर आर्थिक तंगी में रहने को मजबूर हैं। पीओजेके के लोगों की समस्याओं, जरूरतों सहित अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए एक बोर्ड का गठन हो, जहां पर हम अपनी बात रख सकें। सरकार राजनीतिक प्रतिनिधित्व दे, ताकि देश के लोग हमारी समस्याओं से अवगत हो सकें।
- दिलीप सिंह चिब, पीओजेके विस्थापित
हम भी है हर सुविधाओं के हकदार
मुजफ्फराबाद में हमारे पास 100 एकड़ की भूमि थी, लेकिन यहां पांच एकड़ भूमि भी नहीं है। पीओजेके के प्रति सरकार का रवैया निराशाजनक रहा है। शिक्षित युवा बेरोजगार हैं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है। राजनीतिक पार्टियां वोट तो लेती हैं, लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं करतीं। कश्मीरी पंडितों को मिल रहीं सुविधाओं के हकदार पीओजेके के लोग भी हैं। आर्थिक तंगी के कारण हमारे बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित हैं। सरकार विस्थापितों को शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दे।
- मेला राम, पीओजेके विस्थापित
खोली जाएं एक तिहाही सीटें
मैं पांच वर्ष का था जब अपना घर, संस्कृति छोड़ कर आया था। आर्थिक तंगी इतनी थी कि परिवार के लिए दो समय का खाना जोड़ना भी मुश्किल था। सरकारों की अनदेखी के बावजूद पिता ने अपने दम पर पढ़ाया और इस काबिल बनाया कि हम अपने अधिकारों की बात कर सकें। भावी पीढ़ी को बेहतर भविष्य देने के लिए पीओजेके की 24 सीटों में से एक तिहाई खोलकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। संसदीय समिति की रिपोर्ट को लागू किया जाए।
- प्रो. केके शर्मा पीओजेके विस्थापित
कश्मीरी पंडितों की तर्ज पर मिलें सुविधाएं
मेरे परिवार के 28 लोगों को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कश्मीर के अनाथालय में बचपन गुजरा और 10वीं तक की पढ़ाई की। अनाथालय के रिकॉर्ड के अलावा मेरे पास कोई अन्य दस्तावेज नहीं है ताकि खुद को पीओजेके का नागरिक साबित कर सकूं। मेरे जैसे अन्य हजारों लोग हैं जो बिना रिकॉर्ड के कारण अधिकारों से वंचित हैं। पीओजेके के लोगों के साथ बहुत अत्याचार हुआ हैं। उन्हें कश्मीरी पंडितों की तरह ही सुविधा मिलनी चाहिए।
- भाई राम सिंह, पीओजेके विस्थापित
सरकार बुनियादी सुविधाएं देने में रही विफल
पाकिस्तान के हमले के बाद हमें अपना घर छोड़ना पड़ा। इसमें पिता को खोया है। 1947 के समय वहां पर हालात ऐसे हो गए थे कि परिवार के सदस्यों ने आत्महत्या का फैसला करना पड़ा। हमारे पास कई एकड़ जमीने थीं, लेकिन आज हमें कुछ एकड़ में ही रहने को मजबूर हैं। कई लोगों का रिकॉर्ड में नाम नहीं है। ऐसे में वह केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद से भी वंचित रह जाते है। जम्मू में 39 शिविरों में पीओजेके विस्थापित रहते हैं। सरकार बुनियादी सुविधाएं देने भी विफल रही हैं।
- सुजांत सिंह, पीओजेके विस्थापित
शिक्षण संस्थानों में आरक्षित की जाएं सीटें
मेरा जन्म तो जम्मू में हुआ है, लेकिन दादी से उस समय की काफी बातें सुनी हैं। उस घटना का असर आज भी हमारे लोगों में दिखता है। लोग मानसिक रूप से परेशान हैं। पीओजेके के लोग कश्मीरी पंडितों से ज्यादा पीड़ित हैं। सरकार की अनदेखी के शिकार हैं। युवाओं को बेहतर शिक्षा मिलनी चाहिए, जिसके लिए सरकार शिक्षा संस्थानों में सीटें आरक्षित करे।
- एडवोकेट प्रतीक महाजन, पीओजेके विस्थापित
सरकारों ने आजतक की अनदेखी
पीओजेके के हर घर की कहानी एक जैसी है। किसी ने अपने दादा तो किसी ने मां और पिता को खोया है। जम्मू में 39 शिविरों में रहते हैं। आर्थिक स्थिति काफी खराब है। इस कारण बच्चों को बेहतर शिक्षा भी नहीं दे पाते हैं। शिक्षा के महत्व को हमारे परिवार के सदस्यों ने समझा था। इतनी प्रताड़ना के बाद भी उन्होंने हमें बेहतर शिक्षा दी। सरकार ने हमारी हमेशा से अनदेखी की है। अब समय आ गया है कि सरकार हमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व दे, ताकि आवाज को बुलंद कर सकें।
- विनोद कुमार दत्ता, पीओजेके विस्थापित