साहिब बंदगी के सद्गुरु ने संत आश्रम रांजड़ी में किए प्रवचन
संवाद न्यूज एजेंसी
ज्यौड़ियां/जम्मू। साहिब बंदगी के सद्गुरु मधु परमहंस महाराज ने शुक्रवार को पूर्णिमा के अवसर पर संत आश्रम रांजड़ी में प्रवचन किए। कहा कि जन्मों के संस्कारों से आपका अंतःकरण बनता है। मेरी मां है, मेरा घर है, यह सब कर्मानुकूल बना। यह संसार कर्म भूमि है। मनुष्य का दिमाग, वृत्तियां, सब कर्मानुकूल हैं। जो बुद्धू है, वह भी कर्मानुकूल है। जो तेज बुद्धि वाला है, वह भी कर्मानुकूल है। कर्म की फांस में सारा संसार बंधा है। इस अनंत ब्रह्मांड में केवल भूमि पर कर्म है। बाकी सब भोग लोक हैं।
बताया कि कर्म से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। जिस संसार में रह रहे हो, कर्म का जाल है। कर्म भी खुद करवाया जा रहा है और कष्ट भी खुद ही दिया जा रहा है। जीव बड़ी लूट में है। फिर आत्मा कर्मों का फल क्यों भोग रही है। यह प्रश्न बहुत बारीक है। कर्म दो प्रकार के हैं। शुभ और अशुभ। दोनों कर्म मन द्वारा संचालित हैं। जब तक दिमाग से चलेगा तब तक सब कर्म सच लगेंगे। जब आत्मनिष्ठ हो जाता है तो वहां मन की क्रिया समझ में आ जाती है। पुण्य कर मनुष्य कर्म करता है और पाप बन जाता है। झूठ, मांसाहार, परस्त्रीगमन, आदि पाप कर्म हैं। लेकिन, जब आत्मा कर्म से अलग है तो भोग क्यों रही है? क्योंकि, निकृष्ट कर्मों को छुपाने के लिए मनुष्य झूठ बोल रहा है। जीभ के स्वाद के लिए मांसाहार कर रहा है। यह सब मन करवा रहा है। लेकिन, आत्मा उर्जा दे रही है। इसलिए, उसे सजा मिल रही है। आप जो भी कर्म कर रहे हैं, मन कर रहा है। मन कभी नहीं चाहता है कि आप आत्मा का कल्याण कर सकें। मन सबको नचा रहा है। स्वांस का सुमिरन आपको अपने में रखेगा। आप मन के वेग में नहीं बहेंगे। इंद्रियों में रमी आत्मा सुमिरन से एकाग्र हो जाएगी। अपने नित्य नियम में सुमिरन को शामिल करो। भय रखो कि 84 लाख योनियां भोगने के बाद मानव तन मिला। यह व्यर्थ न जाए।