साहिब बंदगी आश्रम अखनूर में मनाया गया वार्षिकोत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी
ज्यौड़ियां। साहिब बंदगी के सद्गुरु मधुपरमहंस महाराज ने सोमवार को अखनूर आश्रम का 32वां वार्षिकोत्सव मनाया। मौके पर उन्होंने प्रवचन भी किए। कहा कि संतों की सदा से निंदा होती आई है। महापुरुषों ने कुरीतियों पर करारा प्रहार किया। जिस तबके के हितों को नुकसान हुआ, उसने विरोध किया। निंदा की परवाह नहीं करनी है। भक्ति में यह सब सहना पड़ता है।
साहिब जी ने कहा कि संतत्व की धारा में गुरु ही मुख्य है। बाकी भक्ति में गुरु केवल मूक दर्शक है। अब समस्या यह हुई कि सबने अपने गुरुओं के साथ संत शब्द जोड़ दिया। उन्हें पता ही नहीं है कि सद्गुरु क्या है, संत क्या है। वे ऋषि, मुनि, तांत्रिक, योगी को भी संत बोल रहे हैं। पांडवों ने यज्ञ किया तो हजारों ऋषि-मुनियों, योगियों को भोजन कराया। लेकिन, यज्ञ के पूर्ण होने वाला घंटा नहीं बजा। जब वासुदेव कृष्ण ने ध्यान किया तो उन्होंने कहा कि इस यज्ञ में एक भी साधु संत ने भोजन नहीं किया है। सब चौंक गए। इतने ऋषि-मुनियों को भोजन कराया। तब उन्होंने कहा कि सुपच सुदर्शन को आमंत्रण नहीं दिया है। उसे खिलाओ। वह कबीर साहिब का शिष्य था। जब उसने भोजन किया तो यज्ञ का घंटा बजा और पांडवों का यज्ञ संपूर्ण हुआ था।
साहिब जी ने कहा कि जब आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है तो यह जगत शून्यमय हो जाता है। जगत अज्ञान के कारण से भास हो रहा है। यह बोलने से बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों का दिमाग चकरा जाएगा। जैसे स्वप्न एक मूर्ख अवस्था है। स्वप्न में मनुष्य ऐसे-ऐसे कर्म करता है, जो कि वो जाग्रत में किसी भी कीमत में नहीं कर सकता। उस मूर्ख अवस्था के कारण ही सब सत्य प्रतीत होता है। इस तरह जब आत्मा पंच भौतिक तत्व और शरीर में मिश्रित हो जाती है तो जगत सत्य लगता है। वास्तव में यह सत्य नहीं है, रात के सपने की तरह है।