पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के क्रम में भाजपा ने भले ही अनुच्छेद 370 पर खामोशी ओढ़ ली हो लेकिन यह मुद्दा अब भी संघ के एजेंडे में सबसे ऊपर है। अब संघ इस मुद्दे पर अलग ढ़ंग की लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहा है।
संघ से जुड़े संगठन जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र ने पहले स्टेट सब्जेक्ट या स्थायी निवासी के मुद्दे पर कानूनी जंग की तैयारी पूरी कर ली है। नागरिकता और अधिकारों में भेदभाव को मुद्दा बनाकर इसके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश शुरू हो गई है।
पहले स्टेट सब्जेक्ट के मुद्दे पर संघर्ष होगा और बाद में अनुच्छेद 370 के लिए रास्ता खुद-ब-खुद निकल आएगा।जम्मू कश्मीर में महिलाओं को पुरुषों जैसे अधिकार हासिल नहीं है। कोर्ट के आदेश से संपत्ति पर तो अधिकार मिला है लेकिन बाहरी पुरुष से शादी की स्थिति में उनके बच्चों से संपत्ति का अधिकार छिन जाता है।
पाकिस्तान के रिफ्यूजियों को नागरिकता नहीं
इसी तरह वाल्मीकि समाज और गोरखों को भी समान अधिकार नहीं दिए गए हैं। वेस्ट पाकिस्तान के रिफ्यूजियों को नागरिकता नहीं मिली है। यह सभी भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 35 ए के नाम पर होता रहा है।
संघ के संगठन जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर ने रिसर्च कर पाया है कि संविधान में 35 ए का प्रावधान संसद द्वारा संशोधन के जरिए नहीं हुआ है। यह तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एक आदेश से संविधान में शामिल हुआ।
तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला की सलाह पर राष्ट्रपति के आदेश के जरिए इन प्रावधानों को संविधान में शामिल कराया।
इस कानून के तहत महिलाओं से भी अधिकार छीने
जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर की समन्वय निदेशक आभा खन्ना कहती हैं कि राष्ट्रपति को आदेश के जरिए संविधान में संशोधन का अधिकार नहीं है। यह सिर्फ संसद कर सकती है। इसलिए अनुच्छेद 35 ए का कोई औचित्य ही नहीं है।
इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया गया है। संविधान में अनुच्छेद 35 ए अपेंडिक्स में मिलता है। इसकी आड़ में महिलाओं के अधिकार छीने गए हैं और अन्य वर्गों से भी भेदभाव हुआ है।
पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की बहन सारा के बच्चों को भी जम्मू कश्मीर में उसकी मां की संपत्ति पर अधिकार नहीं है। इस अधिकार के लिए सुनंदा पुष्कर भी संघर्ष करती रहीं।
सफाईकर्मी का बेटा सफाईकर्मी ही क्यों बने
जम्मू कश्मीर में 1957 में म्यूनिस्पेलिटी में हड़ताल हुई थी। तब पंजाब से सफाईकर्मी बुलाए गए। उन सफाईकर्मियों को नागरिकता तो दी गई लेकिन उनके बच्चे अब सफाईकर्मी पद के अलावा कोई नौकरी नहीं पा सकते।
इसी तरह गोरखों को चौकीदारों की नौकरी तक सीमित कर दिया गया है। कानूनी जंग से ही मानवाधिकारों के इस उल्लंघन को तोड़ निकलेगा।