संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का...यह नारा 90 के दशक में गूंजता था। तब कारसेवा के लिए अयोध्या गए तालाब तिल्लो के डॉ. रामपाल शर्मा बताते हैं कि तपस्या पूरी हो गई। लंबे संघर्ष के बाद रामलला का मंदिर बनने जा रहा है। 1990 में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने कारसेवकों को 30 अक्तूबर तक अयोध्या पहुंचने, पूजा करने और भगवा ध्वज फहराने का आह्वान किया था। तब उत्साह और एक अलग जोश था। परिवार ने जाने से नहीं रोका। जम्मू से लगभग 40 लोगों का जाना तय हुआ।
26 वर्ष की आयु में 23 अक्तूबर को अयोध्या के लिए ट्रेन में निकले। इतना पता था कि लखनऊ स्टेशन तक पहुंचना है फिर आगे कहां रहना व जाना है का पता नहीं था। जब ट्रेन में चढ़े तो सोचा कि एक साथ नहीं बैठेंगे, इसलिए अलग-अलग केबिन में बैठ गए। हरदोई स्टेशन में 14 साल का बिल्लू नाम का लड़का आया और उसने नारा लगा दिया कि बच्चा-बच्चा राम का, तो बाकी लोग बोले- जन्मभूमि के काम का। इसे सुनते ही पुलिस वालों को पता लग गया कि ट्रेन में कारसेवक जा रहे हैं। उन्होंने नीचे उतार दिया। इसके बाद डोगरा रेजिमेंट में चढ़ गए। आर्मी वालों से कहा कि कारसेवा के लिए जा रहे हैं, चाहे कुछ भी हो जाए दरवाजा नहीं खोलना। अन्य 33 लोगों को पहले ही पुलिस ने हिरासत में लेकर हरदोई थाने में बंद कर दिया था।
हम सात लोग लखनऊ पहुंचे। एक व्यक्ति ने कहा कि आप लोग यहां ठहर जाओ। आराम करते हुए 15 मिनट भी नहीं हुए थे कि पुलिस आ गई। सभी दौड़े। एक महात्मा बाबा पूरी मिले, जो ऑटो में बैठे थे। वे आलम नगर ले गए। अगले दिन जब अखबार पढ़ी तो पता चला कि 33 लोगों (जो साथ थे) को रॉड से पीटा गया। तीन की टांगे टूट गईं, दो के सिर और एक की आंख में चोट लगी। सभी लखनऊ अस्पताल में भर्ती थे और बाकियों को सीतापुर जेल भेज दिया था। अयोध्या जाने से पहले बाबा पूरी ने एक गमछा और पान दिया। उसी वेशभूषा में साथियों से मिले। इसके बाद बाबा पूरी ने मालगाड़ी में भेजा और उनके कहने पर 20-25 मिनट बाद छलांग लगा दी। अयोध्या पहुंचे तो देखा कि हजारों कारसेवक हनुमानगढ़ी में थे। पुलिस ने बैरिकेड्स लगाए थे। उस समय का दृश्य भयावह था। पुलिस के लाठीचार्ज से कइयों की अंगुलियां टूट गईं, सिर फट गए लेकिन वे पीछे नहीं हटे। हवाई फायरिंग के बाद गोलियां चलनी शुरू हो गईं। कुछ ही क्षण में कारसेवकों ने विवादित ढांचे को घेर लिया। कुछ दीवारों और गुंबद पर चढ़ गए। बाद में पुलिस ने क्षेत्र कब्जे में ले लिया। तीन-चार दिन बाद स्थिति सामान्य हो गई और कारसेवकों को हटा दिया गया। जेलों से भी रिहा किया गया। मां कहती थी कि जब वहां से खबरें आती थी तो हम रो पड़ते थे। हिंदू जागरण मंच के जम्मू-कश्मीर प्रांत संयोजक 1992 की कारसेवा के बारे में कहते हैं कि उस वक्त अयोध्या में चार से पांच लाख लोग पहुंचे थे।