घोष ने भारत-पाकिस्तान पर पूछे एक सवाल के जवाब में कहा- हर बंटवारा मिट जाएगा अगर प्यार बांटा जाए। मैं तो चाहूंगा कि यह ग्रेटर इंडिया दुबारा से बन जाए, बांग्लादेश हम से जुड़ जाए, पाकिस्तान भी हमारे साथ जुड़ जाए। पूरा भारत और विश्व एक साथ हो जाए। यह संस्कृति ही इन सभी को जोड़ सकता है। पॉलिटिकल डिस्कशन इन चीजों को नहीं जोड़ सकेगा। उनकी पत्नी मानुषी दास ने बताया कि उनके पति प्रोफेसर शामिक घोष गणित के प्रोफेसर हैं और इस काम का कोई अनुभव नहीं था। वह बतौर एक कलाकार यह समझ पाई कि वह इस कार्य को बिना सहायता पूरा नहीं कर पाएंगे। इसलिए मैंने भी इस कार्य में उनका पूरा सहयोग देने की ठान ली और हमने कर दिखाया।
कश्मीर के प्रसिद्ध सूफी शायर अहद जरगर के पुत्र मुश्ताक अहमद जरगर ने प्रोफेसर घोष के कार्य की सराहना करते हुए कहा कि, जो कुछ इन्होंने किया है आज तक कोई कश्मीरी नहीं कर पाया है। कल्चरल अकादमी और कश्मीर विश्वविद्यालय के लिटरेचर विभाग जिसे सूफिस्म को बढ़ावा देने का बीड़ा सौंपा गया था वह भी यह सब नहीं कर पाया। कश्मीर के सूफी संतों की कविताओं का अगर अनुवाद हो तो लोग समझ पाएंगे और फिर यह दुनिया में एक अहम स्थान हासिल कर पाएगी।
कौन थीं लल्लेश्वरी
लल्लेश्वरी या लल्ल-दय्द के नाम से जाने जानेवाली चौदहवीं सदी की एक भक्त कवियित्री थी जो कश्मीर की शैव भक्ति परंपरा और कश्मीरी भाषा की एक अनमोल कड़ी थीं। लल्ला का जन्म श्रीनगर से दक्षिण पूर्व में स्थित एक छोटे से गांव पांदरेठन में हुआ था। वैवाहिक जीवन सुखमय न होने की वजह से लल्ला ने घर त्याग दिया था और 26 साल की उम्र में गुरु सिद्ध श्रीकंठ से दीक्षा ली। कश्मीरी संस्कृति और कश्मीर के लोगों के धार्मिक और सामाजिक विश्वासों के निर्माण में लल्लेश्वरी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।