जंगली जानवरों के रिहायशी इलाकों में घुसने की घटनाओं पर अंकुश लगाने की कवायद शुरू कर दी गई है। रियासत में पहली बार वनों में फलदार पेड़-पौधे लगाने का अभियान शुरू किया गया है।
यही नहीं, भविष्य में वनों में जितना भी पौधारोपण किया जाएगा, उसमें 30 फीसदी फलदार पौधे होंगे। जंगलों को छोड़कर भोजन की तलाश में रिहायशी में पहुंच रहे वन्यजीवों को भोजन मुहैया कराने के लिए यह पहल शुरू की गई है।
विभाग ने इसे गंभीरता से लिया है। दरअसल, विभाग ने हाल ही में एक अध्ययन किया है, जिसमें यह बात सामने आई है कि जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों के भोजन का साधन कम हो गया है।
इनमें जंगली फल मुख्य रूप से शामिल हैं। बंदर, रीछ, तेंदुए आदि खाने की तलाश में जंगलों से बाहर आने को मजबूर हो रहे हैं।
मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अश्विनी गुप्ता का कहना है कि वन विभाग जंगलों में फलदार पेड़-पौधे लगाएगा। इसमें बेर, अमरूद, आंवला, घरना और नाशपाती मुख्य रूप से शामिल हैं।
जब जंगलों में फलदार पौधे होंगे, तो जानवरों को बाहर नहीं आना पड़ेगा। इस अभियान को शुरू कर दिया गया है। कुछ दिन पहले शुरू किए गए इस अभियान के तहत अब तक एक लाख फलदार पेड़ पौधे लगाए जा चुके हैं।
अध्ययन में पता चला है कि वनों में भोजन का कम होना, जंगली जानवरों को बड़े हद तक प्रभावित कर रहा है। इसके चलते रहने-सहने का सिस्टम बदल रहा है।
बंदरों पर किए जा रहे शोध में यह बात सामने आई है कि उनका जीवन तेजी से प्रभावित हो रहा है। लंबे समय से चलने वाली इनकी डाइट में फर्क आ गया है।
पहले जड़ी बूटी और फल खाने वाले बंदर अब मानवों द्वारा खाए जाने वाली चीजें खा रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से ब्रेड शामिल हैं।
वनों से फलदार पौधों की तेजी से कटाई तो की गई, लेकिन इसकी भरपाई के लिए पौधारोपण नहीं किया गया। विभाग के एक अनुमान के मुताबिक पिछले दो दशकों में 10 लाख से अधिक फलदार पेड़ पौधे काट दिउ गए या फिर कुदरती आपदाओं के चलते नष्ट हो गए।