पहलगाम में पर्यटकों की कायराना हत्या से पूरे जम्मू-कश्मीर में उबाल है। पाकिस्तान के खिलाफ आक्रोश का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि प्रदेश बंद में हिंदू-मुस्लिम, महिला-पुरुष जैसे भेद मिट गए हैं। छोटे-छोटे बच्चे सड़कों पर हैं। घटना के दूसरे दिन जम्मू से पहलगाम की ओर बढ़ने पर सूनी सड़कों और सांय-सांय करतीं सुरम्य वादियों के बीच कहीं कोई नजर आता है, तो काफी अंतराल के बीच फर्राटा भरता कोई वाहन।
ज्यादातर वाहन मिलिट्री अथवा पुलिस के हैं या स्थानीय लोगों के। कस्बों के आसपास गुस्से व गमजदा लोगों का समूह पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाता, उसकी निंदा करता, आक्रोश जताता दिख जाता है।
चहकने लगी थी वादियां, पढ़ने लगे थे बच्चे...आने लगा था पैसा
कटड़ा से पहले एनएच पर करीब 60 साल के बुजुर्ग रिजवान से मुलाकात हुई। चिनैनी से अपने रिश्तेदारी में जा रहे रिजवान कहते हैं कि पाकिस्तान कश्मीरियों की वकालत का राग अलापता रहता है। उसे पूरी शिद्दत के साथ पता है कि आम कश्मीरियों की रोजी-रोटी दुनिया भर से आने वाले सैलानियों से होने वाली कमाई से चलती है। एक वक्त था जब अलगाववादियों के हुक्म पर घाटी में हफ्तों दुकानें बंद रहती थीं।
घाटी के ज्यादातर इलाकों में अक्सर बाहर बवाल रहता था तो घरों के भीतर मरघटी सन्नाटा। एक पीढ़ी बिना अच्छी पढ़ाई के निकल गई। पिछले पांच-छह सालों में जो सबसे बढ़िया हुआ था, वह यही कि यहां सैलानियों ने आना शुरू कर दिया था। रिकॉर्ड सैलानी आ रहे थे। छोटे-छोटे स्पॉट सैलानियों से भर गए थे। इधर सब गुलजार हो गया था।
घरों में पैसा आने लगा था। घाटी के कोने-कोने में वादियां चहकने लगी थीं। बच्चे स्कूल जाने लगे थे। पढ़ने लगे थे। पाकिस्तान ने इस कायराना हरकत से कश्मीरियों के पेट पर लात मारने का काम किया है। अब घाटी में सैलानी नहीं आएंगे। सैलानी नहीं आए तो फिर दुर्दिन शुरू हो जाएंगे। हमने हर तरह के दिन देखे हैं। अब इस तरह के दिन नहीं देखना चाहते थे।
पर्यटक बोले...स्थानीय लोगों के समर्थन के बिना संभव नहीं हमला
इसी एनएच पर वैष्णो देवी आधार शिविर की ओर मुड़ने से पहले एक राहगीर पंकज सलाथिया मिल गए। करीब 29 साल के पंकज बहुत गुस्से में हैं। कहते हैं कि केंद्र में जो भी सरकार आती है, सिर्फ घाटी पर कृपा बरसाती है। सारे जतन कि दुनिया के सैलानी कश्मीर की घाटियों में जाएं।
वे वहां खर्च करें और कश्मीरियों की हालत बदले। लेकिन, हुआ क्या? घाटी के तमाम लोग सैलानियों के पैसों पर पलते हैं और जब पैसा हो जाता है तब उन्हीं सैलानियों का कत्ल कराते हैं। उनका धर्म पूछकर, नंगा करके, जबरन कलमा पढ़ाने की हरकत करके उन्हें मौत के घाट उतारते हैं।
पंकज यह मानने को तैयार नहीं हैं कि इस घटना से स्थानीय लोगों का कोई लेना-देना नहीं है। वह कहते हैं कि ऐसी घटना तब तक हो ही नहीं सकती जब तक स्थानीय लोगों की मुखबिरी न हो। ओवर ग्राउंड वर्कर का समर्थन न मिलता हो।
वह कहते हैं कि बाहरी आतंकी तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक उन्हें स्थानीय समर्थन न हो। आतंकियों के साथ उनके समर्थकों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारने की जरूरत है। सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव लाना चाहिए। घाटी से अच्छी वादियां और पर्यटक स्थल जम्मू में हैं। यहां सैलानियों को बुलाने की जरूरत है।
पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा
जम्मू से पहलगाम की ओर बढ़ने पर सैलानियों व श्रद्धालुओं का बड़ा जमघट वैष्णो देवी कटड़ा में रहता है। यहां हर वक्त हजारों की संख्या में श्रद्धालु रहते हैं। आज कटड़ा में गिनती के लोग नजर आ रहे हैं। दुकानें बंद हैं और स्थानीय लोग पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। माता के दर्शन के लिए आए विपिन कुमार कहते हैं कि पहलगाम की घटना ने रोंगटे खड़े कर दिए हैं। मीडिया, सोशल मीडिया पर जो कुछ दिख रहा है, वह अकल्पनीय है। इससे सैलानियों में बहुत खराब असर गया है।
लोग कह रहे हैं कि अब कश्मीर नहीं जाएंगे। यह खुफिया व सिक्योरिटी फेल्योर वाला मामला है। जहां सैकड़ों की संख्या में लोग जाते हों, वहां सिक्योरिटी न हो, यह सोचा कैसे जा सकता है। अब पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाने की जरूरत है, जिसे उनकी पीढि़यां याद रखें। इस बार सिर्फ मीटिंग व बयानों से काम चलने वाला नहीं है। लोग इससे संतुष्ट नहीं हो सकते।
सैलानी सदमे में, स्थाीय लोग जीविका छिनने की आशंका से बेचैन
पहलगाम की घटना के खिलाफ जम्मू से श्रीनगर तक और अनंतनाग से पुलवामा, पांपोर, रियासी, डोडा, किश्तवाड़ तक एक जैसा माहौल नजर आ रहा है। साथी बताते हैं कि सैलानी सदमे में हैं तो स्थानीय लोग अपनी जीविका छिनने की आशंका में बेचैन नजर आ रहे हैं। लेकिन, सबकी चाह एक ही है कि इस बार हिसाब कुछ ऐसा होना चाहिए कि आगे पाकिस्तान व आतंकी कभी ऐसा दुस्साहस न कर पाएं।
पहलगाम की भरपाई आसान नहीं
जम्मू-कश्मीर में आतंकी नरसंहार नया नहीं है। घाटी से 2003 में नदिमार्ग में आतंकियों ने 24 कश्मीरी पंडितों को लाइन में खड़ाकर गोलियां मार दी थीं। फरवरी 2019 में पुलवामा में आतंकियों ने घात लगाकर सुरक्षाबलों पर हमला किया था, जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान बलिदान हुए थे। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरी बार शपथग्रहण के दिन शिवखोड़ी से लौट रहे श्रद्धालुओं के बस पर आतंकी हमले के जख्म आज तक लोगों के जेहन में हैं।
आतंकी घटनाओं में स्थानीय हिंदुओं से लेकर तमाम मुस्लिम परिवारों ने कीमत चुकाई है। आए दिन आतंकी दुस्साहस लोग देखते रहते हैं। लेकिन, पहलगाम में आतंकियों ने देश-दुनिया के पर्यटकों के साथ जो हैवानियत भरा कृत्य (26 पर्यटकों की हत्या) किया है, उससे पूरा जम्मू-कश्मीर रो रहा है। ऐसा रो रहा है, जैसा पहले शायद ही कभी रोया हो। ये आंसू सूखने में वक्त लगेगा। इसकी कीमत घाटी को सालों तक चुकानी पड़ सकती। इसकी भरपाई आसान नहीं है।
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