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खुलासा: जम्मू कश्मीर में बड़ी संख्या में रहते थे वनमानुष

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रियासत के भूगर्भ में जीव जगत के तमाम रहस्य छिपे हैं। ऐसा ही एक रहस्य यह है कि यहां बड़ी संख्या में वनमानुष (औरेंगउटान) रहते थे।
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विशेषज्ञों के शोध में पता चला है कि यहां 75 लाख साल से लेकर 1.30 करोड़ साल तक वनमानुष आबाद थे। समय के साथ मौसम में बदलाव के चलते वे विलुप्त हो गए।

जियोलोजिकल रिकार्ड के अनुसार 1924 में तीन अमेरिकी जियोलोजिस्ट ब्राउन, ग्रेगरी और हेलमैन ने यहां उधमपुर जिले के रामनगर में वनमानुष के खोपड़ी का जीवाश्म खोजा।

यह रामनगर के गेस्ट हाउस से करीब दो किलोमीटर पूर्व में पाया गया था। इसे उन्होंने ड्रायोपिथेकस पिलीग्रिमी नाम दिया। बाद में शिवालिक रेंज में मिलने वाले इनके जीवाश्मों को रामापिथेकस फिर शिवापिथेकस नाम दिया गया। यह जीवाश्म अमेरिकन म्यूजियम नोविटेट्स में रखा है।
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कार्बन डेटिंग के मुताबिक 1.30 करोड़ साल पुराने हैं वनमानुष

इसके बाद कई भारतीय विज्ञानियों ने भी यहां शोध किए और वनमानुषों के जीवाश्म खोज निकाले। पंजाब विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और वनमानुषों के जीवाश्म के विशेषज्ञ डॉ. राजीव पटनायक यहां लगातार शोध कर रहे हैं।

उन्होंने भी रामनगर इलाके से वनमानुषों के कुछ अंगों के जीवाश्म खोज निकाले हैं। उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में रामनगर इलाके से वनमानुषों की खोपड़ी, दांत, जबड़े और जांघ की हड्डियों के जीवाश्म मिले हैं।

यहां से मिले कुछ जीवाश्म कोलकाता के नेशनल म्यूजियम में भी रखे हैं। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के पोटवार में 1979 में एक खोपड़ी का जीवाश्म मिला था। हिमाचल के घुमर्विन, हरिटलयंगर, उत्तराखंड के रामनगर में भी वनमानुषों के जीवाश्म मिले हैं। कहा कि जो भी जीवाश्म मिले हैं वे कार्बन डेटिंग के मुताबिक 75 लाख से 1.30 करोड़ साल पुराने हैं।
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इस ल‌िए व‌िलुप्त हो गए वनमानुष

डॉ. पटनायक ने बताया कि उस समय यहां के हरे भरे वर्षा वन वनमानुषों के पर्यावास के पूरी तरह अनुकूल थे। वनमानुष पाकिस्तान से लेकर म्यांमार तक फैले हुए थे। धीरे-धीरे यहां का मौसम ठंडा और शुष्क होता गया। जिसकी वजह से यहां के वर्षा वन समाप्त हो गए।

पूरा इलाका घास के मैदान के रूप में तब्दील हो गया। संभवत: वे मौसम के इस बदलाव के अनुरूप अपने को ढाल नहीं पाए होंगे। इस वजह से विलुप्त हो गए या दक्षिण एशिया की तरफ पलायन कर गए।

डॉ. राजीव पटनायक
पंजाब विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। अब तक वनमानुषों के जीवाश्म पर क्रमश: 1994, 1997 और 2005 में उनके शोध प्रकाशित हो चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर में भी उन्होंने रामनगर से कुछ जीवाश्म तलाशे हैं, जिस पर अभी शोध जारी है।
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