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कश्मीरी पंड़ितों की घर वापसी कराए भाजपा: उमर

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जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भाजपा के घर वापसी अभियान पर निशाना साधा है। उमर ने ट्वीट करके भाजपा का ध्यान कश्मीरी पंड़ितों की घर वापसी की ओर खींचा है।
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बता दें 25 साल पहले 1989 में कश्मीर से कश्मीरी पंड़ितों को वहां से भगा दिया गया है। इस दौरान हजारों कश्मीरी पंड़ितों को मौत के घाट उतार दिया गया था।

उमर ने ट्वीट करके कहा, 25 साल हो चुके हैं, यह बहुत बड़ा वक्त होता है, अगर घर वापसी करानी ही है तो भाजपा और अन्य सभी को इस घर वापसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

25 years is a lifetime. If there is a ghar wapasi the BJP & the rest of us should really be focusing on it is this one. #KashmiriPandits— Omar Abdullah (@abdullah_omar) January 19, 2015
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जान‌िए कैसे शुरू हुई थी मार-काट

कश्मीरी पंड़ित बताते हैं कि 1990 के दशक में जब चरमपंथ अपने चरम पर था तो कई चरमपंथियों ने चुन-चुन कर कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया। बल्कि थोड़ा और पीछे जाएं तो चरमपंथी गतिविधियों के तहत राज्य में पहली गोली चौदह सितंबर, 1989 को चली जिसने भारतीय जनता पार्टी के राज्य सचिव टिक्का लाल टपलू को निशाना बनाया।

उसके डेढ़ महीने बाद जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट के नेता मकबूल बट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या की गई और कश्मीरी पंडितों में एक दहशत का माहौल पैदा हो गया। तेरह फरवरी, 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या के साथ कश्मीरी पंडितों का धैर्य चुकने लगा।

उस समय बड़े पैमाने पर इन लोगों ने राज्य से पलायन किया और अपना घर संपत्ति और जमीन से महरूम यह कश्मीरी पंडित भारत के अलग-अलग राज्यों में बड़ी दयनीय स्थिति में जीवन बिता रहे हैं। उनमें से कुछ का मानना है कि इस आंदोलन को हवा देने में कुछ उन राजनीतिज्ञों का भी हाथ है जो इस सारे घटनाक्रम को अलगाववाद के बजाय सांप्रदायिकता का रंग देना चाहते थे।
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कश्मीरी पंडितों ने किया बहुत संघर्ष

कश्मीरी पंडितों ने देश-विदेश में अपनी कई अलग-अलग संस्थाएं बनाईं। पनुन कश्मीर यानी हमारा कश्मीर ऐसी ही एक संस्था है। इस संस्था ने भारत भर में आंदोलन के जरिए कश्मीरी पंडितों की समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करने का बीड़ा उठाया और इस बारे में केंद्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को कई ज्ञापन भी दिए।

कश्मीरी पंडितों ने अपनी व्यथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने भी रखी। आयोग ने इस बात को तो माना कि राज्य में मानवाधिकारों का हनन हुआ है लेकिन उनकी इस मांग को अस्वीकार कर दिया कि उन्हें नरसंहार का शिकार और आंतरिक रूप से विस्थापित माना जाए।

आज वे इतने भयभीत हैं कि सरकार के लाख आश्वासनों के बावजूद घर लौटने को तैयार नहीं हैं। उनमें आशा और विश्वास कब जागेगा, इस बारे में अभी तो कोई कयास भी लगाना मुश्किल है।
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