माता वैष्णो देवी की आरती के लिए तय फीस पर आपत्ति जताते हुए डाली गई जनहित याचिका पर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व अन्यों को नोटिस जारी किया।
न्यायाधीश अली मोहम्मद मागरे और न्यायाधीश बीएस वालिया की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर गौर किया। याचिका में श्री माता वैष्णो श्राइन बोर्ड के 11 अगस्त 208 के अध्यादेश पर आपत्ति जताई गई है।
इस अध्यादेश में बोर्ड ने आरती के दौरान पूजा करने वालों की फीस निर्धारित की है। याचिका में दलील दी गई है कि करोड़ों लोगों की आस्था, भावनाओं का बोर्ड ने व्यवसायीकरण कर दिया है। पवित्र गुफा के बाहर व अंदर पूजा करने वालों के लिए अलग-अलग से फीस निर्धारित की गई है।
फीस करने वालों को ही आरती के दौरान पूजा की इजाजत
प्राचीन गुफा की पूजा करते पुजारी
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दिन और रात 24 घंटे के बीच दो बार आरती होती है। केवल वही श्रद्धालु इस आरती में बैठ सकते हैं, जो मोटी राशि दे सकते हैं। जिनके पास रुपये नहीं हैं, उन्हें गेट के बाहर ही खड़ा रखा जाता है। वे माता की आरती भी नहीं देख सकते हैं।
भारतीय संविधान या कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि आरती करने के लिए श्रद्धालुओं को फीस चुकानी पड़े। प्रशासन केवल प्रशासनिक व्यवस्था देख सकता है, लोगों की आस्था पर फीस नहीं लगा सकता है। उसने एक व्यापारी की तरह तानाशाहाना ढंग से फीस निर्धारित कर दी।
पहली पंक्ति के लिए मोटी फीस और दूसरी, तीसरी व अन्य पंक्तियों के लिए क्रमश: कम फीस निर्धारित की गई है। एडवोकेट सुमित नायर ने कहा कि भारतीय संविधान, जम्मू कश्मीर के कानून के तहत सभी लोगों को अपनी आस्था व धर्र्म के अनुसार पूजा करने की छूट है। उस पर फीस या अन्य चार्ज नहीं लगाए जा सकते हैं। इस अध्यादेश से लोगों की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंची है। इसे रद्द करने की अपील की गई।