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आखिर क्या है कश्मीर की 'आधी विधवाओं' का दर्द

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'आधी विधवा' मीमा बेगम हर रोज़ अपने एक छोटे से कमरे की खिड़की से बाहर झांकती रहती हैं। पैंतालीस साल की मीमा ज़रा सी आहट सुनती हैं, तो उन्हें लगता है कि कहीं ये 'वो' तो नहीं!
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उनके पति गुलज़ार अहमद ज़रगर 2007 में घर से निकले थे और आज तक वापस नहीं लौटे हैं। गुलज़ार अहमद ज़रगर वन विभाग में काम करते थे। उन्होंने पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस स्पेशल पुलिस

अफ़सर के तौर पर काम किया था। लेकिन चार साल बाद उन्होंने वहां से काम छोड़ दिया था। मीमा एक कमरे के अपने घर में चार बच्चों के साथ रहती हैं।

उन्हें जायदाद में हिस्सा नहीं दिया गया

दमहाल हांजीपोरा के पुलिस स्टेशन में गुलज़ार अहमद के लापता होने का मामला दर्ज है। मीमा ने अपने ससुराल वालों पर भी आरोप लगाया है कि उन्हें जायदाद में हिस्सा नहीं दिया गया है।

अब वो इसके लिए ससुराल वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। कश्मीर में मीमा जैसी हज़ारों ‘आधी विधवाएं’ हैं जिन्हें जायदाद में हिस्सा नहीं मिला है।

पिछले 27 साल में भारतीय सुरक्षा बलों पर इनके पति को ग़ायब करने का आरोप लगता रहा है। कुछ ऐसे आम नागरिक हैं जिनके बारे में पता नहीं चल पाया है कि वो कैसे ग़ायब हुए हैं।

चार साल बाद 'आधी विधवाओं' की शादी हो सकती है

कश्मीर के ज़िला कुलगाम के खुरई बटपोरा की मीमा बताती है, "मैंने जगह जगह अपने पति की तलाश की, लेकिन कहीं कोई सुराग़ नहीं मिल पाया। मैंने पाकिस्तान में भी पता किया और कश्मीर के हर सिक्योरिटी कैंप में उन्हें तलाश किया, लेकिन हर जगह से निराश ही लौटी।"

कश्मीर में ऐसी महिलाओं के लिये काम करने वाले संगठन 'एसोसिएशन ऑफ़ डिसअपियर्ड पर्सन्स' की मुखिया परवीन अहनगर कहती हैं, "कश्मीर में आधी विधवाओं की तादात हज़ारों में है।

इनकी शादी का मसला तो हल हो गया लेकिन अब इनका सबसे बड़ा मसला ससुराल वालों की तरफ़ से जायदाद में हिस्सा न मिलने का है। मैंने धार्मिक उपदेशकों से इस सिलसिले में कई बार मदद लेने की कोशिश की है।"

धार्मिक संगठनों ने पांच साल पहले फ़तवा जारी कर कहा था कि पति के ग़ायब होने के चार साल बाद 'आधी विधवाओं' की शादी हो सकती है।

पति पत्नी को भी कई साल तक घर से दूर रहना पड़ा

मीमा कहती हैं कि जब उनके पति पुलिस में थे तो कई बार चरमपंथियों ने घर जाकर उन्हें धमकाया और जब पुलिस की नौकरी छोड़ दी तो सुरक्षा बल उन्हें तंग करने लगे।

वो बताती हैं, "स्पेशल टास्क फ़ोर्स और सेना के लोग गुलज़ार से कहते थे कि वह फिर से उनके साथ काम करना शुरू करे"। हालात इस क़दर ख़राब हुए कि पति पत्नी को भी कई साल तक घर से दूर श्रीनगर में रहना पड़ा।

मीमा कहती हैं कि पिछले आठ सालों में उन्होंने मज़दूरी करके अपने बच्चों को पाला है और किसी ने उनकी मदद नहीं की। मीमा के दो बेटे पुलवामा के अनाथ आश्रम में रहते हैं। कुछ महीने पहले मीमा ने कश्मीर के मानवाधिकार आयोग में पति के ग़ायब होने की शिकायत दर्ज करवाई है, लेकिन अभी तक केस की सुनवाई नहीं हो पाई है।

मुनेरह आज तक अपने पति की वापसी की राह देख रही हैं

मीमा कहती हैं कि वो जायदाद की लड़ाई अपने छोटे छोटे बच्चों के लिये लड़ रही हैं। जिला बाराहमुला के अंदर गाम की रहने वाली 44 साल की ‘आधी विधवा’ मुनेरह बेगम के पति मुहम्मद अकबर राथर पिछले 19 साल से लापता हैं।

परिवार वालों का आरोप है कि राथर को भारतीय सेना के लोग 1996 में पूछताछ के लिए घर से अपने साथ ले गए थे। लेकिन वो आज तक वापस नहीं लौटे। मुनेरह आज तक अपने पति की वापसी की राह देख रही हैं।

वो बताती हैं, "मेरी शादी को उस समय चार वर्ष बीत चुके थे जब मेरे पति को सेना ने लापता कर दिया। मुझे आज भी अपने पति का इन्तज़ार है। इस बात की संभावना आज भी है कि शायद वो किसी सिक्योरिटी कैंप में होंगे।"

मुनेरह अपने बेटे के साथ पिछले 19 वर्ष से अपने मायके में रह रही हैं। वो दूसरी शादी नहीं करना चाहती हैं। अभी तक मुनेरह ने अपने ससुराल वालों के साथ जायदाद में हिस्सा लेने की कभी कोई बात नहीं की है।
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जायदाद में मुझे हिस्सा देते तो बेहतर होता

वो कहती हैं, "अगर ससुराल वाले ख़ुद ही जायदाद में मुझे हिस्सा देते तो बेहतर होता। मैं सोचती हूँ कि मेरे कहने की नौबत न आए। उनको ये अहसास हो जाए, मेरे और मेरे बेटे के लिये वो लोग कुछ सोचें"।

राथर जिस समय ग़ायब हुए थे उस समय वह एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक थे। लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद सरकार की तरफ़ से मुनेरह को एक लाख का मुआवज़ा मिला है। मुनेरह के पिता हाजी ग़ुलाम रसूल परे ने अपनी बेटी को दोबारा शादी करने के लिये कई बार राज़ी करना चाहा लेकिन मुनेरह इसके लिये तैयार नहीं हुई।

उनका कहना है, "मैंने शुरू के वर्षो में अपनी बेटी से दोबारा शादी करने के मुद्दे पर बात तो की, लेकिन वह इसके लिए कभी तैयार नहीं हुई। उसने बार बार मुझसे कहा कि अगर आप मुझे पनाह देगें तो मैं आपके साथ रहूंगी"।

साल 2000 में अदालत के आदेश के बाद पुलिस स्टेशन पटन में भारतीय सेना की आठवीं 'राजपुत राइफ़ल्स' के ख़िलाफ़ मुहम्मद अकबर को लापता करने का मामला दर्ज कराया गया था। फिर 13 दिसंबर 2005 को केस को बंद करते हुए 'राथर' को लापता क़रार दे दिया गया।
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