90 साल के हो चुके अमरनाथ को चलने में अब काफी दिक्कत होती है। अधिकतर वे बीमार रहते हैं, लेकिन फिर भी पिछले 70 वर्षों से वोट डालने की आदत नहीं छूटी। इस बार वे अपने पोते साथ मतदान केन्द्र पर आए। पोते ने अपने कंधों पर उठाया और मतदान केंद्र के अंदर तक पहुंचाया, जहां अमरनाथ ने मतदान किया।
वहीं, 100 वर्ष की फातिमा बीवी चल नहीं सकतीं। अब उनको सुनाई भी नहीं देता। अपने जीवन के सौ बसंत देख चुकीं फातिमा का शरीर अब उनका कहा नहीं मानता। फातिमा की मतदान की इच्छा को पूरा किया उनकी बहू ने। वे अपनी बहू के साथ मतदान केंद्र पहुंचीं और अपना वोट डाला।
शनिवार को अंतिम चरण के मतदान में बुजुर्गों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने साबित कर दिया कि बीमारी और लाचारी पर लोकतंत्र में शरीक होने का जज्बा भारी है। अमरनाथ कहते हैं कि एक वोट से किसी प्रत्याशी की किस्मत का भाग्य तय हो सकता है। इसलिए वे हर बार वोट डालने आते हैं।
जीतने वाला जीत दर्ज करने के बाद उनके किसी काम आए या न आए, लेकिन वोट डालना वह अपना कर्तव्य समझते हैं। फातिमा बीबी को सुनाई नहीं देता, न ही वे चल सकती हैं, लेकिन वोट डालने के लिए पहुंचीं। अमर उजाला ने कई मतदान केंद्रों पर मतदाताओं में जबरदस्त जोश देखा।
अखनूर, सुंदरबनी, नौशेरा में करीब 10 मतदान केंद्रों पर हुई वोटिंग में बुजुर्गों का मतदान केंद्रों तक पहुंचना सराहनीय है। कई ऐसे लोग मिले जिन्हें लकवा है, लेकिन वे किसी तरह मतदान केंद्र पहुंचे और वोट डाला।