-निर्माण लागत घटेगी, घरेलू मांग बढ़ेगी, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत होंगे उत्पाद
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के कश्मीरी हस्तशिल्प और हैंडलूम उत्पादों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरें घटाने के संकेत से प्रदेश के कारीगरों व व्यापारियों में नई उम्मीद जगी है। उनका मानना है कि इससे घरेलू बाजार में इन उत्पादों की कीमतें घटेंगी, कारीगरों का मुनाफा बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कश्मीरी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा क्षमता भी मजबूत होगी।
व्यापारियों ने विदेशों में वेयरहाउस उपलब्ध कराने और कश्मीर में तकनीकी विकास की मांग भी उठाई है।
हस्तशिल्प व हैंडलूम का जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान है। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से पांच लाख से अधिक लोग इस क्षेत्र से जुड़े हैं। बीते वर्षों में इन उत्पादों का निर्यात भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। वाणिज्यिक खुफिया और सांख्यिकी महानिदेशालय के आंकड़ों के अनुसार, कोविड काल में वर्ष 2021-22 में निर्यात घटकर 563.13 करोड़ रुपये रह गया था, जो 2022-23 में बढ़कर 1,116.37 करोड़ रुपये और 2023-24 में 1,162.29 करोड़ रुपये पहुंच गया।
विभिन्न उत्पादों की बात करें तो, 2023-24 में पश्मीना शॉल का 477.24 करोड़, कालीन का 317.33 करोड़, क्रूएल कढ़ाई का 233.46 करोड़, वुड कार्विंग का 40.28 करोड़ और पेपर माशे का 38.44 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ।
घरेलू बाजार में राहत, उत्पादन क्षमता में इजाफा संभव
हैंडलूम व्यवसाय से जुड़े लतीफ भट्ट ने बताया कि निर्यात भले ही जीएसटी-मुक्त होता है, लेकिन निर्माण में इस्तेमाल होने वाली इनपुट सामग्री पर लगने वाला टैक्स छोटे कारीगरों के लिए बड़ी चुनौती है। इससे लागत बढ़ जाती है और ग्राहक महंगे उत्पादों से बचते हैं। प्रस्तावित जीएसटी कटौती से निर्माण लागत घटेगी और घरेलू बाजार में मांग बढ़ेगी।
विदेशों में वेयरहाउस और कश्मीर
में तकनीकी विकास की मांग
कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष जावेद अहमद टेंगा, जो स्वयं भी हस्तशिल्प व्यवसाय से जुड़े हैं, ने बताया कि चैंबर ने वाणिज्य मंत्री से खाड़ी और यूरोपीय देशों में कश्मीरी उत्पादों के लिए वेयरहाउस उपलब्ध कराने की मांग की है। उन्होंने कश्मीर में हस्तशिल्प और हैंडलूम से जुड़ी तकनीकों को और उन्नत बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि इससे कश्मीरी उत्पाद चीन जैसे देशों के सस्ते उत्पादों से मुकाबला कर सकेंगे।
इन उत्पादों को मिला है जीआई टैग
1- कश्मीरी पश्मीना शॉल- चंगथांगी बकरियों की ऊन से बनी यह शॉल अपनी बारीकी, हल्केपन और मुलायमाहट के लिए प्रसिद्ध है।
2- कानी शॉल - लकड़ी की ‘कानी’ सुइयों से बुनी जाने वाली पारंपरिक शॉल, जिनमें रंग-बिरंगे फूल-पत्तियों के महीन पैटर्न होते हैं।
3-सोजनी कढ़ाई - दोहरे धागों से की जाने वाली महीन कढ़ाई, जो शॉल, दुपट्टों और कुरताओं पर की जाती है।
4- कश्मीरी कालीन - ऊन या रेशम से हाथ से गूंथे गए कालीन, जिनमें पारंपरिक फारसी डिजाइन होते हैं।
5- पेपर माशे - कागज की लुगदी से बने रंग-बिरंगे सजावटी उत्पाद, जिन्हें हाथ से पेंट किया जाता है।
6- खतमबंद - लकड़ी के टुकड़ों को जोड़कर बनाई जाने वाली पारंपरिक छत की डिजाइन, जो मस्जिदों और कश्मीरी घरों में पाई जाती है।
7- अखरोट लकड़ी की नक्काशी - दुर्लभ अखरोट की लकड़ी पर की जाने वाली बारीक नक्काशी, जो फर्नीचर और सजावटी वस्तुओं को खास बनाती है।
8- बसोहली पेंटिंग - कठुआ जिले की पारंपरिक पहाड़ी लघु चित्रकला, जो चटकीले रंगों और धार्मिक विषयों के लिए जानी जाती है।
9- बसोहली पश्मीना - हाथ से काते और बुने गए अत्यंत कोमल व गरम शॉल, मफलर और कंबल, जो बसोली क्षेत्र की विशेष पहचान हैं।