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धर्म और राजनीति को अलग करना जरूरी : उपराष्ट्रपति

Sat, 02 Apr 2016 11:06 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
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छात्रों को संबोध‌ित करते उपराष्ट्रपत‌‌ि - फोटो : अमर उजाला
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उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि धर्म और राजनीति को अलग करना जरूरी है। यदि ऐसा हो जाएगा तो देश की बेहतर सेवा की जा सकती है। नागरिकों के संवैधानिक अधिकार दिलाने में न्यायपालिका की महत्ता बढ़ती जा रही है। अपनी समस्याओं के निदान के लिए लोगों का रुख न्यायपालिका की ओर तेजी से बढ़ा है।
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उन्हें विश्वास है कि न्यायपालिका के सामर्थ्य से उन्हें तेजी से न्याय मिलेगा। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका वर्तमान मुद्दों से ऊपर होती है, पर उनसे परे नहीं। न्यायाधीश के प्रशिक्षण में यदि न्यायिक स्वभाव की भी सहभागिता हो तो इससे उस समूह को विस्तारित करने में मदद मिलेगी। उपराष्ट्रपति शनिवार को जम्मू विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। 

उन्होंने कहा कि भारतीय समाज के बहुलतावादी धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप को ध्यान में रखकर संविधान में धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की नींव रखी गई थी। उसमें देश के अलग-अलग इलाकों की विविध पहचानों को मिटाकर सभी को एकरूप करने का कोई जिक्र नहीं है।
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उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा है कि वह उन रूपरेखाओं को स्पष्ट करने की कोशिश करे, जिसके भीतर धर्मनिरपेक्षता और मिश्रित संस्कृति के सिद्धांतों पर कार्य किया जा सके। इससे कार्यप्रणाली को सुद्ृढ़ करने के साथ ही व्यवस्था में व्याप्त अस्पष्टता को भी दूर किया जा सकेगा।
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'आस्था के सिद्धांतों को संस्कृति की रचना से अलग करने की आवश्यकता'

दीक्षांत समारोह में मौजूद उपराष्ट्रपत‌ि, चीफ जस्ट‌िस व अन्य - फोटो : अमर उजाला
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आस्था के सिद्धांतों को संस्कृति की रचना से अलग करने की आवश्यकता है। स्पष्टता के बावजूद धर्मनिरपेक्षता पर विभिन्न व्याख्याएं रखी गईं हैं और कोर्ट में भी इस विषय पर कोई वास्तविक आम सहमति नहीं है।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की पूर्व की घोषणाओं से कुछ धर्मनिरपेक्ष वर्गों के ‘धर्मनिरपेक्षता के अत्यंत ही गैर धर्मनिरपेक्ष के दृष्टिकोण की जीत हुई है।’ ऐसे में यदि धर्म और राजनीति को पूरी तरह से अलग कर दिया जाए तो लोकतंत्र की बेहतर सेवा की जा सकती है।

अंसारी ने कहा कि भारत का धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र और मिश्रित संस्कृति का मामला संवैधानिक आदर्श के रूप से हमारे सामने है। 130 करोड़ आबादी, 4635 समुदाय और आबादी का 19.4 फीसदी हिस्सा धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं।

इसी बहुलता के बीच हमारी लोकतांत्रिक राजनीति और धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की नींव रखी गई, जो अनोखी है। धर्मनिरपेक्षता को लगभग विभिन्न मतों ने सैद्धांतिक रूप में स्वीकार किया है। धर्मनिरपेक्षता में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के तत्व हैं। भारतीय संविधान में हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने के अधिकार प्राप्त है।
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