अगर आपके आसपास किसी व्यक्ति में मिर्गी के लक्षण दिखते हैं, तो उसका तुरंत डाॅक्टरी इलाज शुरू कराएं। डाॅक्टरों के अनुसार अधिकांश मामलों में पीड़ितों को देरी से चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाया जाता है, जिससे उनका इलाज लंबा चला जाता है। खासतौर पर झाड़फूंक में पड़ने पर पीड़ित की हालत अधिक खराब हो जाती है। इसके कारण कई बार पीड़ित को उम्र भर दवा के सहारे रहना पड़ता है।
मिर्गी एक केंद्रीय तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार है। इसमें मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिका (नर्व सेल) गतिविधि प्रभावित होती है। इस कारण दौरा या कुछ समय तक असामान्य व्यवहार, उतेजना और बेहोशी की समस्या आ जाती है। मिर्गी संक्रामक रोग नहीं है। इसके दौरे के लिए सिर में चोट लगना, रसौली होना, क्लाॅट जमना, एनसीसी नामक कीड़े का मस्तिष्क में चले ना, कच्चा मीट खाना आदि कारण हो सकते हैं। जेनेटिक मामलों में परिवार के सदस्य को 20 से 30 प्रतिशत तक मिर्गी होने की आशंका रहती है।
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में न्यूरोलाॅजिस्ट डाॅ. हरदीप पुरी ने बताया कि सामान्य तौर पर न्यूरो की रूटीन 150 से 200 की ओपीडी में 20 से 30 मामले मिर्गी के आ रहे हैं। इससे शहरी और ग्रामीण इलाकों से दोनों से लोग प्रभावित हुए हैं। कई पीड़ितों को दिमाग के एक हिस्से से मिर्गी का दौरा पड़ता है तो कुछ को दिमाग के पूरे हिस्से में प्रभाव रहता है। ऐसे मामलों में मरीज को कम से कम दो साल दवा खानी पड़ती है। लेकिन अधिकांश मामलों में लोग इस बीमारी को छुपाने की कोशिश करते हैं, जिससे हालत खराब होती चली जाती है और अस्पताल पहुंचने पर कई बार उसे उम्र भर दवाई पर रखना पड़ता है। बच्चों को बुखार के मामलों में दौरा पड़ने से बचाव करना चाहिए।