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जम्मू-कश्मीर: पंचायत चुनाव का बहिष्कार करेगी नेशनल कांफ्रेंस, फारुक बोले- 35A पर रुख साफ करे केंद्र

Wed, 05 Sep 2018 05:05 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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Farooq Abdullah
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नेशनल कांफ्रेंस ने राज्य में होने वाले स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव के बहिष्कार का एलान किया है। पार्टी के अध्यक्ष डॉ. फारुक अब्दुल्ला ने कोर ग्रुप की बैठक के बाद बुधवार को साफ कहा कि जब तक केंद्र और राज्य सरकार अनुच्छेद 35-ए को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करती और कोर्ट के बाहर और भीतर इसे सुरक्षित करने को प्रभावी कदम नहीं उठाती, पार्टी इस फैसले पर कायम रहेगी। नेकां के इस फैसले से राज्य में चुनाव प्रक्रिया को झटका लगा है।
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सरकार ने बीते सप्ताह ही स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव कराने का शेड्यूल घोषित किया था। इसके तहत अक्तूबर के पहले सप्ताह में स्थानीय निकाय चुनाव कराने की घोषणा की गई थी, जबकि नवंबर-दिसंबर माह में पंचायत चुनाव कराया जाना प्रस्तावित है। लेकिन बुधवार को एनसी के चुनाव को लेकर दिखाए गए तेवर के बाद रियासत की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
 
राज्य की स्थिति को नहीं रखा ध्यान
अब्दुल्ला ने फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि पार्टी के कोर ग्रुप ने एकमत से यह फैसला किया है। राज्य प्रशासन पर स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव कराने का फैसला जल्दबाजी में कराने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान रियासत की वर्तमान स्थिति को ध्यान में नहीं रखा गया, जो कि  अनावश्यक रूप से अनुच्छेद 35-ए को लेकर पैदा हुई हैं।
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कोर्ट का वर्तमान रुख लोगों की अपेक्षाओं के विपरीत
अब्दुल्ला ने कहा कि कोर ग्रुप ने रियासत की वर्तमान स्थिति खास तौर पर संविधान के अनुच्छेद 35-ए को लेकर विस्तार से चर्चा की। साफ किया कि अनुच्छेद 35-ए से किसी भी तरह की छेड़छाड़ न केवल रियासत, बल्कि पूरे देश के लिए संकट खड़ा होगा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान रुख पूरी तरह रियासत केलोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं के विपरीत है।

केंद्र पर समझौते की अनदेखी का आरोप
नेकां अध्यक्ष ने कहा कि केंद्र इस बात को नजरअंदाज कर रहा है कि संविधान में यह प्रावधान भारत सरकार और रियासत सरकार केबीच पूरी तरह विचार विमर्श के बाद 1952 में हुए दिल्ली समझौते का हिस्सा बना था और इसे संविधान में शामिल किया गया था। अब्दुल्ला ने कहा कि कोर ग्रुप ने यह तय किया है कि वह उनके संवैधानिक गारंटी में हस्तक्षेप करने वाले सभी प्रयासों के खिलाफ जमीनी लड़ाई लड़ेगी। उन्होंने कहा कि इस तरह केप्रयास होने दिए जाते हैं तो यह केंद्र और राज्य के  संबंधों की बुनियाद पर चोट समान होंगे। 

पहली बार किसी राजनीतिक दल ने किया चुनाव बहिष्कार का एलान
यह पहला मौका होगा जब मुख्यधारा की किसी पार्टी ने राज्य में होने वाली चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने से इंकार किया है। इससे पहले सिर्फ अलगाववादी और आतंकवादी ही चुनाव के बहिष्कार की करते रहे हैं । निकाय-पंचायत चुनावों का शेड्यूल जारी होने के बाद ही अलगाववादी और आतंकी इन चुनावों के बहिष्कार का एलान कर चुके हैं। 

चार चरणों में निकाय व आठ चरणों में होने हैं पंचायत चुनाव
 निकाय चुनाव एक से चार अक्टूबर के बीच चार चरणों में होंगे। पंचायत चुनाव आठ नवंबर से चार दिसंबर के बीच आठ चरणों में आयोजित किए जाएंगे। यह फैसला राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अध्यक्षता में हुई राज्य प्रशासनिक परिषद (एसएसी) की बैठक में लिया गया था।
 

यह है 35-ए में

-जम्मू एवं कश्मीर के बाहर का व्यक्ति राज्य में अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता। 
-दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यहां का नागरिक नहीं बन सकता।
-राज्य की लड़की किसी बाहरी लड़के से शादी करती है तो उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाएंगे।
-35-ए के कारण ही पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थी अब भी राज्य के मौलिक अधिकार तथा अपनी पहचान से वंचित हैं। 
-जम्मू एवं कश्मीर में रह रहे लोग जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं है, वे लोकसभा चुनाव में तो वोट दे सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं दे सकते हैं।
-यहां का नागरिक केवल वह ही माना जाएगा जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या इससे पहले या इस दौरान यहां पहले ही संपत्ति हासिल कर रखी हो।  
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इसलिए है अनुच्छेद 35ए पर इतना विवाद

देश में संविधान 26 जनवरी 1951 को लागू हुआ। इसमें अनुच्छेद 370 भी था जो जम्मू कश्मीर को एक विशेष दर्जा देता था। लेकिन 1954 में इसी अनुच्छेद में एक उपबंध के रूप में अनुच्छेद 35ए जोड़ दिया गया। यह मूल संविधान का हिस्सा ही नहीं है बल्कि परिशिष्ट में रखा गया है। इसीलिए कई सालों तक इसका पता ही नहीं चला। संस्था की वरिष्ठ सदस्य आभा खन्ना के अनुसार अनुच्छेद 35ए को न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा में कभी पेश किया। इसे सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश (प्रेसिडेंशियल आर्डर) के जरिए अनुच्छेद 370 में जोड़ दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक, चूंकि यह संसद से पारित नहीं हुआ, इसलिए यह एक अध्यादेश की तरह छह महीने से ज्यादा लागू नहीं रह सकता।
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