जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार गिरने के साल भर के भीतर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की नींव धीरे-धीरे दरक रही है। लोकसभा चुनाव में हार का स्वाद चख चुकीं महबूबा मुफ्ती को अब अपना पीडीपी रूपी किला संभालना मुश्किल हो रहा है। आधा दर्जन से अधिक पूर्व मंत्रियों व पूर्व विधायकों के पार्टी से किनारा कसने के बाद अब संस्थापक सदस्य खलील बंड ने भी अलविदा कह दिया। पार्टी के 20वें स्थापना दिवस (28 जुलाई) से दस दिन पहले दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले के पूर्व विधायक खलील बंद के पार्टी छोड़ने से पीडीपी को गहरा झटका लगा है।
पीडीपी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि ऐसे ही पार्टी से एक-एक कर नेताओं के जाने का सिलसिला जारी रहा तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। दक्षिणी कश्मीर पीडीपी का गढ़ रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में यहां के अनंतनाग, शोपियां, पुलवामा व कुलगाम में पार्टी के एक दर्जन विधायक जीते थे।
इनमें से एक पुलवामा के राजपोरा से विधायक रहे तथा पार्टी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद के करीबी डॉ. हसीब द्राबू ने लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़कर दक्षिणी कश्मीर में सबसे पहले पार्टी को झटका दिया। इसके बाद अब पुलवामा के विधायक खलील बंद के इस्तीफे ने संगठन को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पिछले चुनाव में कोकरनाग से अब्दुल रहीम राथर, डोरू से फारूक अंद्राबी, नूराबाद से अब्दुल मजीद पाडर, वाचि से एजाज मीर, शोपियां से एडवोकेट युसूफ, पांपोर से जहूर मीर, अनंतनाग से महबूबा मुफ्ती तथा बिजबिहाड़ा से अब्दुल रहमान वीरी विधानसभा में पहुंचे थे।