कश्मीर हिंसा के मुद्दे पर मंगलवार को दूसरे दिन भी विधानसभा सत्र गरमाया रहा। नेकां के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि 2010 की हिंसा की जिम्मेदारी उन्होंने स्वयं ली थी न कि किसी दूसरे पर थोपी थी।
कश्मीर के हालात के लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उनकी सरकार। यदि मुख्यमंत्री में हालात की जिम्मेदारी लेने की इच्छाशक्ति नहीं है तो फिर वह इस पद पर बने रहने की हकदार नहीं हैं। महबूबा पर निशाना साधते हुए कहा कि वह बार-बार अमन की बात करती हैं। कहती हैं कि कुर्सी पर बैठने का मकसद अमन और भारत-पाक के बीच दोस्ती लाना है। इन दोनों ही मोर्चों पर वह फेल हो गई हैं। वह यह भी कहती रही हैं कि यदि मिशन में फेल हो गई तो फैसला कर लेंगी। कम से कम कुर्सी छोड़ने का तो वह फैसला नहीं कर सकती हैं।
विधानसभा में काम रोको प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि कश्मीर हिंसा के दौरान स्थिति को संभालने में सरकार की ओर से बहुत ही लचीला रवैया अपनाया गया। कई गलत कदम भी उठाए गए। क्या मुख्यमंत्री अपने को इस हालात के लिए जिम्मेदार मानती हैं। नेता को अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और उससे शिक्षा लेनी चाहिए। कहा कि बुरहान वानी सहित तीन आतंकियों के मारे जाने के दौरान कई प्रकार की बातें सामने आईं।
पहले खबर आई कि तीन आतंकी फंसे हैं, फिर आई कि मारे गए और फिर खबर मिली कि बुरहान भी उसमें एक था। बुरहान की मौत के बाद हालात लगातार बिगड़ते गए। बुरहान एनकाउंटर पर भी अलग-अलग बयान आए। एडीजी सीआईडी ने प्रेस कांफ्रेंस कर बताया था कि एनकाउंटर के विषय में सीएम को बताया गया था। कुछ ही घंटे बाद बयान बदल दिया गया।
उन्होंने कहा कि सदन को यह बताना चाहिए कि सीएम को एनकाउंटर के बारे में क्या जानकारी थी और इसके बाद की स्थिति से निबटने के लिए क्या इंतजाम किए गए थे। कुछ दिनों बाद मुख्यमंत्री ने रेडियो तथा अन्य माध्यमों से यह कहा कि यदि कोई ज्यादती हुई होगी तो जिम्मेदार लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही उन्होंने अभिभावकों को भी दोषी ठहराया।
उन्होंने कहा कि हुकूमत की जिम्मेदारी किसी दूसरे पर नहीं थोपी जाती है। उन्होंने 2010 की हिंसा के लिए कभी भी पाक, बच्चों, अभिभावकों या अफसरों को जिम्मेदार नहीं ठहराया। विपक्ष पर उंगली नहीं उठाई।
महबूबा पर जमकर बरसे उमर
विधानसभा में हंगामा करते विधायक
- फोटो : AMAR UJALA
उन्होंने कहा कि 2016 का जवाब 2008 और 2010 से देने की कोशिश की जा रही है तो जवाब उसमें नहीं मिलेगा। बेशक कुछ समानताएं हो सकती हैं, लेकिन इन घटनाओं में फर्क है। उन्होंने कहा कि लगातार विरोधाभासी बयानबाजी होती रही। मीडिया पर हमला किया गया। सर्वदलीय बैठक बुलाने में काफी देर की गई।
नेकां पर आरोप लगाए गए कि वह रियासत में आग लगा रही है। मुख्यमंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने बयान दिया था कि इस मुद्दे पर उमर से बात हुई है, जबकि हकीकत यह है कि उन्होंने कभी भी कोई बात नहीं की। हिंसा के दौरान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को नियुक्त करने के समय मुलाकात हुई थी, जबकि इससे पहले ही उन्होंने यह बयान दिया था कि महबूबा से बात हुई है।
हमले जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि नेकां पर 1987 के हालात के आधार पर आतंकवाद को भड़काने का मुख्यमंत्री ने सदन में आरोप लगाया। यह आरोप मुख्यमंत्री पद को शोभा नहीं देता। आप वही सियासत कर रही हैं जो विपक्ष में रहकर करती थीं। हालात से चिंतित होकर दिल्ली के दरवाजे खटखटाए तो शक के नजरिये से देखा गया।
लौटे तो नेकां, कांग्रेस, सीपीआई एम में फूट डालने की कोशिश की गई। कहा कि 2010 की हिंसा के दौरान वह भी दिल्ली गई थीं। उन्होंने कहा था कि उमर को हटाते ही रातोंरात हिंसा थम जाएगी, लेकिन उन्होंने दिल्ली दौरे पर ऐसा कुछ नहीं कहा। 28 जुलाई को पीडीपी के स्थापना दिवस पर महबूबा ने कहा कि यदि पता होता कि बुरहान है तो एक मौका दिया जाता।
विरोध प्रदर्शन एक व्यवसाय बन गया है। कटाक्ष करते हुए कहा कि महबूबा को यह सब 2010 में नजर क्यों नहीं आया। आज सब कसूरवार नजर आ रहे हैं सिवाय अपने आप के। डिप्टी सीएम ने भी कटड़ा में एक कार्यक्रम में आपके सुर में सुर मिलाते हुए कह दिया कि बुरहान गलती से मारा गया। सुप्रीम कोर्ट में इतने विरोधीभासी बयानों के बाद हालात तो बिगड़ने ही थे, क्योंकि लोगों का एतबार उठने लगा है।