दरअसल मध्ययुगीन इतिहास में कोटा रानी को अपने विरोधियों को जहर देने से लेकर कपटपूर्ण तरीके से सत्ता में बने रहने का उल्लेख है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि जिला मजिस्ट्रेट ने इसे पीएसए की कार्रवाई का आधार नहीं बनाया है। पीएसए का जो अंतिम आदेश जारी किया गया उसमें इसे आधार नहीं बनाया गया।
दस्तावेजों के अनुसार, राजनीतिक पार्टी के रूप में पीडीपी के गठन पर भी कोई टिप्पणी नहीं है। जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने पुलिस डोजियर में इन शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए माफी मांगी है। अधिकारियों ने कहा कि यह पता लगाने के लिए एक जांच चल रही है कि जिस दस्तावेज में इन बातों का उल्लेख किया गया वह सार्वजनिक कैसे हो गए।
जिस आधार पीएसए की कार्रवाई की गई उसमें पिछले 10 वर्षों के दौरान महबूबा द्वारा सार्वजनिक दिए गए भाषणों को आधार बनाया गया। महबूबा ने जमकर भड़काऊ भाषण दिए हैं, आतंकियों का महिमा मंडन किया, उनके भाषणों ने समाज के एक वर्ग में भय पैदा किया।
आदेश में पिछले साल 5 अगस्त को उनके ट्वीट का भी हवाला दिया गया है जिसमें उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 370 का खत्म किया जाना भारत के साथ जम्मू-कश्मीर का विलय भी स्वत: खत्म हो गया। क्योंकि भारत के साथ विलय का आधार ही अनुच्छेद 370 था।