हर चुनाव के साथ कोई खास बात हमेशा जुड़ी होती है। जम्मू-कश्मीर लोकसभा चुनाव की बात करें तो उसके करीब आधी सदी के इतिहास में 80 का दशक ऐसा रहा, जब चुनाव सर्दी के मौसम में हुए। लोगों ने तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद लोकतंत्र के यज्ञ में वोट रूपी आहुति दी। 80 का दशक कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के दबदबे का दौर था।
बात 1980 से शुरू करें। इस साल के लोकसभा चुनाव के दौरान तीन और छह जनवरी को मतदान हुआ। कांग्रेस को दो, जबकि जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस को तीन सीटों पर जीत हासिल हुई। एक सीट पर स्वतंत्र प्रत्याशी ने कब्जा जमाया। इसके बाद 1984 में लोकसभा चुनाव हुए। इस दौरान 24 दिसंबर को वोट पड़े।
कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस ने बराबर-बराबर सीटें जीतीं। दोनों का स्कोर 3-3 का रहा। ठीक पांच साल बाद, जब 1989 में चुनाव हुए तो मतदान 22 और 24 नवंबर को संपन्न कराया गया। इस साल कांग्रेस (आई) और कांग्रेस (यू) को एक-एक, नेशनल कांफ्रेंस को तीन सीटें हासिल हुए। एक सीट पर एक बार फिर स्वतंत्र प्रत्याशी ने कब्जा जमाया।
यही वह साल था, जिसके बाद कश्मीर घाटी में हालात खराब हो गए और साल बीतते-बीतते हालात ये हो गए कि हजारों कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। 1990 में राज्यपाल शासन लगा दिया गया। 1991 में हालात को देखते हुए यहां चुनाव नहीं कराए गए। सूबे में हुए बाकी अन्य सभी लोकसभा चुनावों पर नजर डालें तो उनके कार्यक्रम मार्च के महीने से लेकर जून के बीच ही ज्यादातर तय हुए।