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सीमा पार से बरस रहे गोलों ने बदल दी जिंदगी

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आरएस पुरा के अरनिया गांव के निवासी शमशेर सिंह कुछ दिन पहले तक ठीक ठाक थे। लेकिन घर के आंगन में गिर रहे पाक गोलों ने उनकी जिंदगी ही बदल दी है। ऐसे माहौल को बार-बार याद कर हैरानगी से उनकी आंख की पुतलियां सामान्य से ज्यादा खुल रही हैं।
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शरीर में तेजी से कमजोरी महसूस करने के साथ उनके दिल की धड़कन भी बढ़ गई है। नींद उड़ी हुई है। वीरवार को साइक्रेटरी अस्पताल में पहुंचे शमशेर में एक्यूट स्ट्रेस रिएक्शन पाया गया। मनोचिकित्सकों के अनुसार सीमा पर लगातार गोलाबारी से हजारों ग्रामीण पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस (पीटीएस) का शिकार हो गए हैं।

चिंता की बात यह है कि यह तनाव पीड़ित पर कई महीनों और साल तक रह सकता है। चारों ओर बारूद की गंध। छलनी हुई घरों की छतें और आंगन। बाहर निकलते ही मौत का डर। यह हालात आजकल अधिकांश सीमांत क्षेत्रों में बने हुए हैं। लगातार ऐसी परिस्थितियां झेलने वाले ग्रामीण भारी तनाव का शिकार हो गए हैं।
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'शारीरिक और मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है'

साइक्रेटरी अस्पताल में कार्यरत मनोचिकित्सक डा. मनु अरोड़ा ने अस्पताल में पीटीएस पीड़ितों के पहुंचने की पुष्टि करते हुए बताया कि आने वाले दिनों में अधिकांश ऐसे ही मरीज पहुंचेंगे। ऐसी कोई भी घटना जिसमें अचानक मौत को बिलकुल करीब से देखा हो, उसमें एक्यूट स्ट्रेस रिएक्शन यानी केटास्ट्रोफिक रिएक्शन हावी हो जाता है।

इस तनाव को झेलने वाले की शारीरिक और मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। भारी तनाव में पता नहीं चलता है कि खुद कहां पर हैं और क्या हो गया। पाक गोलाबारी के चलते ऐसे तनाव को झेल रहे हृदय रोगियों को हार्ट अटैक का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। सीमा पर गोलाबारी के दौरान ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। सीमा पर हालात सामान्य हो जाने के बावजूद प्रभावित ग्रामीण पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस में रहेंगे।

'इसका असर छह माह तक रह सकता है'

इसका असर छह माह तक रह सकता है। इसमें बच्चों में खासकर उनकी शारीरिक, मानसिक और व्यक्तिगत गतिविधियां पूरी तरह से बदल जाएंगी। ऐसे बच्चे अकेलापन सहन नहीं कर पाएंगे, सहमे रहेंगे, अंधेरे से डर लगेगा, छोटी सी आवाज यानी कोई पटाखा चलने पर भी लगेगा कि कहीं हमला हो गया है।

कई लोगों के भागने पर लगेगा जैसे कोई गोले बरसने लगे हैं, ऐसे हालात में लगेगा कि बेहोशी छा रही है, हाथ-पांव कांपना या ठंडे पड़ जाएंगे, किसी काम में ध्यान नहीं लगेगा, हर समय असुरक्षा की भावना महसूस करना, भूख न लगना, मन विचलित या उदास रहना, हर समय डिप्रेशन में रहना, उल्टी और दस्त लगना, ऐसे कई लक्षण रहेंगे।

ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ित व्यक्ति की पूरी जिंदगी ही बदल जाती है।
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ऐसी घटनाओं से कैसे लें इलाज

ऐसी घटनाओं से पीड़ित लोगों को काउंसिलिंग दी जाती है। इसमें साइकोथैरेपी का भी सहारा लिया जा सकता है। इसके अलावा पारिवारिक काउंसिलिंग करवाना जरूरी है। पीड़ित के  सामने बीती बातों को न दोहराया जाए।

उसे हर तरह से अच्छा माहौल देने की कोशिश की जाए। इसमें पीड़ित को पंद्रह दिन की काउंसिलिंग के बाद भी अगर उसकी हालत में सुधार नहीं होता है तो उसे मानसिक तनाव से बाहर लाने के लिए दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है।
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