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लद्दाख: ठंडे मरुस्थल में बीमारी लेकर आती है बहार, लेह के आठ गांवों में पर्यावरणीय सिलिकोसिस से पीड़ित हैं लोग

Tue, 28 Feb 2023 02:27 AM IST
विमल शर्मा ओमपाल संब्याल, जम्मू

सार

रेतीले इलाके में मार्च आते ही धूल भरी आंधी चलने लगती है। आंधी के साथ धूल अपने साथ सिलिकॉन के कण लेकर आती है, जिससे फेफड़े लाइलाज सिलिकोसिस से ग्रस्त हो जाते हैं। कुछ गांवों की आबादी में 50 फीसदी तक ग्रामीण सिलिकोसिस से पीड़ित हैं।
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लेह में उठती धूल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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बहार के मौसम में लद्दाख की विश्व प्रसिद्ध खुबानी के पेड़ फूलों से भरने वाले हैं लेकिन यह खुशनुमा मौसम सिंधु घाटी से सटे गांवों में बीमारी भी लेकर आता है। लेह जिले के आठ गांव पर्यावरणीय सिलिकोसिस की समस्या का सामना करते हैं। रेतीले इलाके में मार्च आते ही धूल भरी आंधी चलने लगती है।

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आंधी के साथ धूल अपने साथ सिलिकॉन के कण लेकर आती है, जिससे फेफड़े लाइलाज सिलिकोसिस से ग्रस्त हो जाते हैं। कुछ गांवों की आबादी में 50 फीसदी तक ग्रामीण सिलिकोसिस से पीड़ित हैं। दरअसल लद्दाख का लेह जिला पर्यावरणीय सिलिकोसिस बीमारी की पहचान करने वाला दुनिया का पहले क्षेत्र है।

सामान्य तौर पर सिलिकोसिस बीमारी सिलिकॉन संबंधित औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों और कामगारों को होती है। लद्दाख में सिंधु घाटी क्षेत्र की मिट्टी में सिलिकॉन पाया जाता है, जो धूल भरी आंधी के साथ पर्यावरणीय सिलिकोसिस बीमारी का कारण बनता है। बहार का मौसम आते ही तेज हवाएं चलती हैं, जिससे सिलिकॉन के कण सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं।
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अत्यधिक सर्दी के मौसम में सांस लेना मुश्किल हो जाता है। सिलिकोसिस से फेफड़ों में संक्रमण का भी खतरा बना रहता है। ऐसे में तीन से चार माह तक दिल्ली में जाकर रहना पड़ता है। हर साल ठंड कम होने पर घर वापसी हो पाती है। - टेंजिन, सिलिकोसिस पीड़ित

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन मानकों के तहत किए गए परीक्षण में लेह जिले के कुछ गांवों में पर्यावरणीय सिलिकोसिस की पहचान की गई थी। शोध के बाद लोगों को रहन सहन में बदलाव की सलाह दी गई। वर्तमान में प्रभावित क्षेत्र के बुजुर्गों में ही यह ज्यादा समस्या है। कुछ गांवों में 50 फीसदी तक भी सिलिकोसिस के लक्षण मिले हैं। मार्च से धूल भरी आंधी चलने लगती है, जिसे लेकर लोगों को एहतियात बरतने के लिए कहा जाता है। डॉ. सेरिंग नुरबू, पर्यावरणीय सिलिकोसिस शोधकर्ता

अस्पताल में 60 फीसदी मामले सीओपीडी (फेफड़ों से संबंधित) के आते हैं, जिनमें से ज्यादातर पर्यावरणीय सिलिकोसिस के होते हैं। यह एक ऐसी समस्या है जिसमें फेफड़े स्थायी रूप से खराब हो जाते हैं। अमूमन मरीज सिलिकोसिस से गंभीर होने के बाद ही अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे मरीजों के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि लद्दाख के बहुत से लोगों को महीनों निचले इलाकों में जाकर रहना पड़ता है। - डॉ. थिनलस, वरिष्ठ फिजिशियन एसएनएम अस्पताल लेह

धूल भरी आंधी के मौसम में लोगों को सिलिकोसिस से बचने के लिए जागरूक किया जाता है। हालांकि पहले से मामलों में कमी आई है, लेकिन फिर भी बदलते मौसम में एहतियातन इंतजाम किए जाते हैं।- डॉ. नुरजिन अंगमो, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, लेह

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