मां-मामी को बचाकर आंसूओं की बारिश में विदा हुई बरखा
घर में आग लगने का सबसे पहले पता बरखा को ही चला। उसने उठते ही सबसे पहले आग के बीच से मां स्वर्णा रैना और मामी नीतू को बाहर निकाला। जब वह बच्चों और पिता को निकालने के अंदर घुसीं तो आग ज्यादा फैल गई और बाहर नहीं निकल पाईं। बचाव कार्य में जुटे लोगों ने उसे घर के अंदर सोफे पर बेधुस हालत में निकाला, लेकिन जान नहीं बचा पाए।
मां र्स्वणा ने बताया कि बेटी ने उनकी जान तो बचा ली, लेकिन सदा के लिए दूर चली गई। परिवार के करीबियों ने बताया कि बरखा की सगाई हो चुकी थी। अब शादी को लेकर तैयारियां चल रही थीं।मां-पिता सहित सारा परिवार खुश था। सेवानिवृत्त डीएसपी अवतार कृष्ण रैना और उनकी पत्नी स्वर्णा रैना ने बड़े चाव के साथ छोटी बेटी को ससुराल विदा करने के लिए कपड़े और अन्य सामान की खरीदारी कर रखी थी।
दुल्हन के रूप में बरखा को सजा हुआ देखने के सपने इस एक हादसे ने तोड़ दिए। बेटी का शव देखकर अभागी मां की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मां ने अंतिम बार आंसूओं की बारिश में बरखा को दुल्हन की तरह सजाकर विदा किया।
पुरमंडल भी रोया...एक साथ जली छह चिताएं
परमंडल। शाम चार बजे परमंडल में सभी का अंतिम संस्कार किया गया। इतने बड़े हादसे की पहले से ही खबर होने के चलते स्थानीय लोगों सहित कठुआ और जम्मू से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। एक साथ छह चिताओं को अग्रिन दी गई तो हर किसी की आंख रोई। इस मौके पर विधायक चंद्रप्रकाश गंगा और विधायक डॉ. देवेंद्र मन्याल भी पहुंचे और शोक संतप्त परिजनों को ढांढ़स बंधाया।
रवींद्र रैना ने कठुआ पहुंच परिवार के साथ जताया दुखकठुआ। भाजपा नेता रवींद्र रैना ने वीरवार को शिवानगर में पहुंचकर हादसे में परिवार को खोने वाली स्वर्णा रैना के साथ दुख जताया। रैना ने कहा कि बहुत की दुखद घटना है। रूह कंपा देने वाले इस हादसे से पूरा प्रदेश गमगीन है। परिवार के साथ इस मुश्किल घड़ी में पूरा जम्मू कश्मीर खड़ा है। इस नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती, लेकिन मुझे यकीन है कि सरकार पीड़ित परिवार की मदद करेगी।
देख बेटा मैं आ गया अब तू भी उठ घर चलें
बेटा, तुम कहां हो। देखो मैंने अपना वादा पूरा किया, मैं आ गया हूं। अब तुम भी उठो, घर चलें। चीखों और रुदन के बीच ये शब्द थे आद्विक के पिता संदीप के। बेटे के शव को देख वह उसे बार-बार उठकर साथ घर चलने की बात कहते रहे, लेकिन नटखट बेटा इस बार चिर निद्रा में था। पिता के बेटे को पुकारने से हर किसी का कलेजा फट रहा था। हर कोई बदहवास पिता को ढांढ़स बंधाता रहा। अंत में संदीप बेटे आद्विक के शव को लेकर जम्मू के जगती स्थित घर चले गए।