एक ऐसा युद्ध जिसकी न तो कोई खबर थी और न तैयारी। एक चरवाहे ने घुसपैठियों की सूचना भर दी थी, जिसकी टोह लेने गया सैन्य दल गायब हो गया। माजरा समझ में आने से पहले ही पाकिस्तानी फौज ने गोले बरसा दिए। अचानक विश्व इतिहास के सबसे कठिन और जोखिम भरे युद्ध की चुनौती सामने खड़ी थी।
सामरिक महत्व की ऊंचाई पर पूरी तैयारी के साथ बैठे दुश्मन से लड़ने के शुरुआती कदम कारगर नहीं हो पाए। रणनीति, सैन्य बल और मारक अस्त्र भी जब काम न आए तो वेतन के दीवानों ने मोर्चा दर मोर्चा फतह दिलाई। अमर उजाला 26 जुलाई को मनाए जाने वाले कारगिल दिवस (विजय दिवस) से जुड़ी यादों को ताजा करने के लिए विशेष शृंखला शुरू कर रहा है।
सबसे मुश्किल थी तोलोलिंग की चुनौती
कारगिल युद्ध में तोलोलिंग का मोर्चा विश्व इतिहास का सबसे मुश्किल मोर्चा माना जाता है। 20 मई को इसे वापस हासिल करने की कोशिशें शुरू हुईं। खड़ी चढ़ाई की वजह से सैनिकों के बैग से 2 किलोग्राम खाद्य सामग्री के पैकेट निकलवाए गए, ताकि ज्यादा असलहा ले जाया जा सके। कारगिल के शहीदों में से आधे तो तोलोलिंग में शहीद हो गए।
भारत ने खोए 527 जांबाज
युद्ध में भारत ने 527 जांबाज खोए, 1363 जख्मी हुए और एक को युद्धबंदी बनाया गया। पाकिस्तान को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। पाकिस्तानी हमलावरों में से 1700 मारे गए, एक हजार घायल हुए और आठ को युद्धबंदी बनाया गया।
एक जुलाई को शहीद हुए थे अब्दुल करीम
12 जैक लाई में हवलदार अब्दुल करीम कारगिल के मोर्चे पर डटे हुए थे। 1 जुलाई, 1999 को उन्होंने शहादत पाई। कठुआ के तारानगर में रह रहे उनके परिवार से बेटे रफीक और पत्नी गुड्डी देवी ने कहा वह उधमपुर के रहने वाले हैं, लेकिन कारगिल युद्ध के दौरान कठुआ में किराये के मकान में रह रहे थे। अचानक उनकी शहादत की खबर ने बदहवास कर दिया था।