राष्ट्रीय रेल परियोजना उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला रेल लिंक परियोजना ने विद्युत रेल चलाकर जो उपलब्धि हासिल की है, उस सपने की पहली बुनियाद 120 साल पहले रखी गई थी। जम्मू-कश्मीर रियासत में तीसरे महाराजा प्रताप सिंह के शासनकाल में नैरा गेज की लाइट इलेक्ट्रिक ट्रेन चलाने की योजना बनाई गई।
कश्मीर घाटी को जम्मू संभाग से रेल के जरिए जोड़ने के लिए बाकायदा दो रूट से सर्वे करवाया गया। बिजली की व्यवस्था के लिए उड़ी के पास चार मेगावाट की मोहरा बिजली परियोजना तैयार की गई। मोहरा बिजली परियोजना तो परवान चढ़ गई लेकिन रेल चलाने का सपना सर्वे से आगे नहीं बढ़ पाया।
1902 में हुआ सर्वे, जम्मू-श्रीनगर के बीच 180 मील लंबा था रूट
महाराजा प्रताप सिंह ने ब्रिटिश इंजीनियरों से 2 फुट 6 इंच और एक मीटर की नैरो गेज लाइट इलेक्ट्रिक विद्युत रेल का सर्वे करवाया। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार जम्मू से श्रीनगर तक रेल चलाने के लिए बनिहाल और लारूलारी दर्रे के दो रूट प्रस्तावित किए गए। प्रस्तावित रूट की कुल लंबाई 180 मील रखी गई।
लारूलारी रूट से परियोजना की अनुमानित लागत 1,71,53000 रुपये रही जबकि बनिहाल दर्रे से परियोजना के लिए 1,93,36000 रुपये की लागत प्रस्तावित की गई। दोनों में से सबसे बेहतर रूट तय करने और परियोजना की व्यवहार्यता जांची गई। बिजली परियोजना तो बनकर तैयार हो गई लेकिन रेल का सपना अधूरा रह गया।