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वाहन दुर्घटना में मारे गए परिवार को न्याय मिलने में देरी पर अदालत ने माफी मांगी

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श्रीनगर। मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) कुलगाम ने शुक्रवार को 13 साल पहले एक वाहन दुर्घटना में जान गंवाने वाले एक मजदूर के परिवार से फैसले में हुई देरी के लिए माफी मांगी है। साथ ही बीमा कंपनी को पहले दी गई आर्थिक मदद के अलावा 1293040 रुपये (बारह लाख, तिरानबे हजार,चालीस रुपये)की राशि दावे की तारीख से 8 फीसदी ब्याज के साथ प्रभावित परिवारों को देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पैसे का भुगतान मृत मजदूर के कानूनी वारिस को किया जाएगा। अदालत ने कहा, इस दावा याचिका के निपटान में देरी को सही ठहराने का कोई प्रयास किए बिना यह न्यायाधिकरण पीड़ित परिवार से याचिका के निपटान में देरी के कारण हुई लंबी पीड़ा के लिए माफी मांगता है।
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कुलगाम के एक मजदूर की वर्ष 2009 में एक वाहन दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उसके परिवार में विधवा पत्नी के अलावा पांच बच्चे थे। परिवार ने मुआवजे के लिए फरवरी 2011 में ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया, लेकिन मुआवजे की राशि उसे अभी तक नहीं मिली।
एसएसीटी के पीठासीन अधिकारी ताहिर खुर्शीद ने मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को कहा कि इस तरह के मामलों को अधिकतम छह माह की अवधि में निपटा दिया जाना चाहिए। परंतु विभिन्न कारणों से ऐसा नहीं हो पाया। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कुलगाम ने एमएसीटी के पीठासीन अधिकारी के रूप में 1868 से 1894 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विलियम इवर्ट ग्लैडस्टोन का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय में देरी का मतलब है न्याय से वंचित रखना, और यहां मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि एक विधवा और पांच अनाथ बच्चों की ओर से दायर मुआवजे के लिए दाखिल तत्काल दावा याचिका उक्त उद्धरण के समर्थन में उद्धृत किया जाने वाला एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
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कोर्ट ने कहा कि लापरवाही से मौत के एक साधारण मामले को इतने सालों में इतना जटिल बना दिया गया कि समय पर मामले का निपटारा नहीं हो सका और मृतक परिवार को 11साल के लंबे समय तक कष्टों को भुगतना पड़ा। लेकिन परिवार हादसे के बाद इतने लंबे समय तक कैसे जीवित रहा यह महसूस करना काफी दर्दनाक है। समय को पीछे ले जाने पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है, और न ही दुनिया में कोई भी ऐसा दावा कर सकता है। बीते समय को दोहराया नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा- यह उस बहती नदी की तरह है जिसका पानी आप दो बार नहीं छू सकते।
अदालत ने कहा, इस दावा याचिका के निपटान में देरी को सही ठहराने का कोई प्रयास किए बिना यह न्यायाधिकरण पीड़ित परिवार से याचिका के निपटान में देरी के कारण हुई लंबी पीड़ा के लिए माफी मांगता है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि कानूनी पेचीदगियों के जाल में मामले को प्रतीक्षा में रखने के लिए अभी भी प्रयास किया जा रहा था, लेकिन अब उसने बीमा कंपनी के किसी भी प्रयास को सफल होने की अनुमति नहीं दी। इसका तार्किक अंत संयोग से सांविधानिक दिवस के शुभ अवसर पर तय किया जा रहा है। आज भारत के संविधान को अपनाने का दिन है जो अपने नागरिकों को त्वरित, सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करता है।
कोर्ट ने कहा, जब किसी भी परिवार का कमाने वाला एक दुर्घटना में मर जाता है, तो यह पीड़ित के परिवार को भावनात्मक और आर्थिक रूप से तोड़ देता है। इस अवधि में एक प्रश्न सबसे गंभीरता के साथ सामने आता है कि जीवित कैसे रहें? यह बहुत ही विकट और दयनीय स्थिति थी।
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मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य, पीड़ित पक्ष को जल्द न्याय मिले
कोर्ट ने कहा कि शोक संत्पत परिवारों को जीवित रहने के लिए विधायिका ने मोटर वाहन अधिनियम कानून वर्ष 1988 (एमवीएसीटी) में लागू किया। यह उन परिवारों के लिए था जिन्होंने अपने प्रियजनों और एक मात्र कमाने वाले को मोटर दुर्घटना में खो दिया। इसका उद्देश्य था कि इस विषम स्थिति में प्रभावित परिवारों को समय पर मुआवजा मिल सके। निश्चित रूप से यह किसी के जीवन की भरपाई नहीं कर सकता परंतु उनके कुनबे को सुरक्षित रह सकता है जो परिवार सम्मान से जीना चाहते हैं। ़अधिनियम का वास्तविक सार यह है कि पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द मुआवजा प्रदान मिले अन्यथा इस कानून का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। हर दिन जो मृतक परिवार की दबाव की जरूरतों को पूरा करने के लिए जेब में एक पैसा के बिना गुजरता है, वह अधिनियम की विफलता है और अपने संविधान में कल्याणकारी देश का अपने नागरिकों को उनके सामाजिक और आर्थिक न्याय को सुरक्षित करने का वादा है।
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