शोपियां में धान की खेती कर रहे किसान। संवाद
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शोपियां। दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के किसान तीन दशक बाद सेब की खेती छोड़कर रिवायती धान की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। उनके अनुसार सेब की खेती में उन्हें नुकसान का सामना करना पड़ रहा था। पिछले कुछ वर्षों से उन्हें अपनी लागत का पैसा बराबर करने में भी दिक्कत आ रही थी। इस बीच शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ इस बदलाव के पीछे ओलावृष्टि से सेबों को हो रहे नुकसान को एक कारण मान रहे हैं।
सेब की खेती करने के करीब तीन दशक से अधिक समय बाद ज़िले के चोदरगुंड के किसान धान की खेती शुरू करके अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। चोदरगुंड गांव के 57 वर्षीय फारूक अहमद वागे ने कहा कि उन्होंने करीब 37 साल बाद अपनी 3.5 कनाल की सेब के बाग वाली जमीन पर धान की खेती फिर से शुरू की है। वागे ने बताया कि उन्होंने 1988 में इसी जमीन पर धान की खेती की थी लेकिन बाद में सेब की खेती शुरू कर दी थी जोकि एक ऐसा चलन था जो इसके मुनाफे के कारण पूरे क्षेत्र में आम हो गया था।
वागे ने कहा, पिछले कई सालों में ओलावृष्टि, बेमौसम बर्फबारी और मौसम में उतार-चढ़ाव जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण हमारी सेब की फसल को बार-बार नुकसान उठाना पड़ा है। अनिश्चितताओं के कारण लागत पूरी होनी भी मुश्किल हो गई थी। उन्होंने कहा कि बढ़ते घाटे और आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने धान की खेती करने का फैसला किया जो इस क्षेत्र में एक पारंपरिक प्रथा है। उन्होंने कहा, सेब की घटती पैदावार के कारण यह फैसला लेना पड़ा क्योंकि हम बहुत गरीब हैं। हमने अपने विकल्पों की समीक्षा करने और अपनी आजीविका के मूल स्रोत पर वापस जाने का फैसला किया।
एक अन्य किसान मोहम्मद शफी ने कहा कि सेब की फसलों को पिछले कुछ वर्षों से बेहद नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि उन्हें भी इसका सामना करना पड़ा है और अगर इस साल भी मुनाफा सही नहीं आया तो वह भी धान की खेती पर ही विचार करेंगे। शफी ने कहा कि हमारे जैसे दर्जनों किसान हैं जो इस पर विचार कर रहे हैं।
स्कॉस्ट की डॉ. समीरा कयूम ने कहा कि धान की खेती में भी उतना ही पानी लगता है जितना पानी सेब की खेती में लगता है, लेकिन शोपियां में ओलावृष्टि की फ्रीक्वेंसी पिछले कुछ समय में बढ़ रही है जिसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक कारण है। उन्होंने कहा कि ओलावृष्टि मार्च के बाद शुरू होती है जिससे सेब की फसल को नुकसान पहुंचता है लेकिन धान छोटा होता है इसलिए उसे नुकसान नहीं पहुंचता। नुकसान का प्रभाव सेबों पर ज़्यादा पड़ने के कारण हो सकता है कि किसान यह फैसला ले रहे हों।