पुरमंडल। क्षेत्र के किसानों ने जंगली जानवरों की बढ़ती संख्या पर गहरी चिंता व्यक्त की है। किसानों का कहना है कि पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण वे पहले से ही प्राकृतिक बारिश पर निर्भर रहते हैं। समय पर वर्षा हो जाए तो फसल अच्छी हो जाती है, लेकिन यदि सूखा पड़ जाए या बारिश समय पर न हो तो खेती करना मुश्किल हो जाता है।
किसानों के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक के कारण सैकड़ों कनाल उपजाऊ भूमि पर खेती बंद करनी पड़ी है। स्थानीय निवासी एवं किसान सागर सिंह ने बताया कि पहले गांवों में बैलों से खेत जोते जाते थे और फसल भी अच्छी होती थी। समय के साथ ट्रैक्टर आने से खेती करना आसान तो हुआ, लेकिन अब खेतों में खड़ी फसल को जंगली जानवर नष्ट कर देते हैं। ऐसे में किसानों को बीज और मेहनत पर किया गया खर्च भी वापस नहीं मिल पाता, जिसके चलते कई खेत बिना जुताई के ही पड़े रहते हैं।
मगर सिंह ने बताया कि दिन में मोर और बंदर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि रात में जंगली सूअर खेतों को बर्बाद कर देते हैं। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
किसान हेमराज ने आरोप लगाया कि सरकार एक ओर किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीव विभाग द्वारा क्षेत्र में बंदरों को छोड़ा जा रहा है, जिससे समस्या और बढ़ गई है। उनका कहना है कि यही बंदर किसानों की फसलें चौपट कर रहे हैं।
पूर्व सरपंच सपना सपोलिया ने बताया कि बंदर और अन्य जंगली जानवर लोगों को अपने आंगन में सब्जियां तक उगाने नहीं दे रहे हैं। स्थिति यह है कि गांव में रहने वाले लोगों को भी बाजार से सब्जियां खरीदनी पड़ रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक स्थल पुरमंडल भी इस समस्या से अछूता नहीं है। यहां बंदर श्रद्धालुओं के हाथों से पूजा सामग्री छीन लेते हैं और कई बार बच्चों व बुजुर्गों पर हमला भी कर चुके हैं। इससे लोगों में भय का माहौल बना हुआ है।
क्षेत्रवासियों ने जिला विकास आयुक्त आयुषी सुदन और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मांग की है कि क्षेत्र में बढ़ती जंगली जानवरों की संख्या पर नियंत्रण किया जाए तथा किसानों की बंजर पड़ी भूमि के लिए मुआवजा योजना बनाई जाए, ताकि प्रभावित किसानों और गरीब परिवारों को राहत मिल सके।