सांबा। डोगरा संस्कृति में कभी सकोलडे (शृंगार वस्तु) का त्यौहार खासा मायने रखता था। आज यह त्यौहार सिर्फ पहाड़ी इलाकों के गांवों तक ही सीमित होकर रह गया है। इस त्यौहार को जीवित रखने के लिए सांबा के निकटवर्ती मानसर क्षेत्र की महिलाएं सकोलडे बनाने का कारोबार कर रही हैं।
सावन मास में ये त्यौहार मनाया जाता है। सकोलडे तैयार कर रही महिला वीणा देवी और सुमित्रा देवी ने बताया कि डोगरा संस्कृति में सकोलडे का पर्व महिलाएं मनाती थीं। सावन मास में जब कोई नवविवाहिता महिला सावन मास में अपने घर आती थी तो साथ में शगुन के साथ सकोलडे लाती थी और मोहल्ले की सभी औरतों और लड़कियों को शृंगार करने के लिए सकोलडे दिया करती थीं।
महिलाओं ने कहा कि शहरों में यह त्यौहार लुप्त हो चुका है, लेकिन जम्मू और हिमाचल के कई हिस्सों में अभी भी मनाया जाता है। सावन माह में वह इसका कारोबार कर कुछ मुनाफा कमा लेती हैं। उनके द्वारा तैयार सकोलडे जम्मू, सांबा, कठुआ और उधमपुर तक सप्लाई होता है।