जम्मू। गर्भावस्था के दौरान पूर्ण एंटीनेटल जांच, मां की अच्छी देखभाल और बच्चे के जन्म के बाद भी पर्याप्त जांच से सेरेब्रल पॉल्सी बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है। इसमें बीमारी को जल्द पकड़कर पीड़ित बच्चे के बेहतर इलाज की संभावना बढ़ जाती है। जम्मू कश्मीर के अस्पतालों में बच्चों में ऐसे दिमागी विकार के मामले रिपोर्ट हो रहे हैं। इनमें कई मामलों में अभिभावक अपने पीड़ित बच्चों की देरी से चिकित्सा शुरू करवाते हैं, जिससे उनके कवर होने की संभावना कम हो जाती है।
सेरेब्रल पॉल्सी एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जो मस्तिष्क की क्षति या विकृति के कारण होता है। यह मांसपेशियों में नियंत्रण गति और पोस्चर को प्रभावित करता है। इसे दिमागी लकवा भी कहा जाता है। यह एक जटिल और प्रगतिशील बीमारी है। इसमें जन्म से पहले, जन्म के समय या जन्म के बाद कभी भी बच्चों में यह बीमारी विकसित हो सकती है। सेरेब्रल पॉल्सी के लक्षण में पीड़ित बच्चे को चलने में कठिनाई, मांसपेशियों में कठोरता और लकवा रहता है।
पीड़ित बच्चों में दिव्यांगता व्यवहार संबंधी समस्याएं देखने और सुनने में कठिनाई आदि की परेशानी रहती है। इस बीमारी में पीड़ित बच्चे को विभिन्न तरह की थेरेपी से इलाज दिया जाता है। अधिकतर मामलों में इस बीमारी में पीड़ित बच्चे को पूरी तरह से कवर करना मुश्किल होता है, लेकिन समय से पहले इसका पता लगाकर इस बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है।
शहर के प्रमुख जच्चा बच्चा अस्पताल एसएमजीएस के बाल रोग विभाग में शिशु विशेषज्ञ डॉ. संजीव ढींगरा का कहना है कि सेरेब्रल पॉल्सी से बचाव के लिए महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान सभी तरह के एंटीनेटल चेकअप करवाने के साथ पर्याप्त पोषण और अच्छी चिकित्सा देखभाल लेनी चाहिए। इसके अलावा बच्चों के जन्म के बाद भी उसकी पूरी तरह से शारीरिक जांच करवानी चाहिए।
जिला स्तर पर अर्ली इंटरवेंशन केंद्र स्थापित
डॉ. ढींगरा के अनुसार सरकार की ओर से जिला स्तर पर जिला अर्ली इंटरवेंशन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसमें सेरेब्रल पॉल्सी से ग्रस्त बच्चों की पहचान करके उन्हें शुरू से ही इलाज देने की कोशिश की जाती है। सामान्य तौर पर एक बच्चे के जन्म के 2 साल के भीतर दिमाग विकसित होता है। इससे पहले मां के पेट में भी बच्चे का दिमाग बनता है लेकिन विभिन्न कारणों से कई बार बच्चों के जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी, इंफेक्शन आदि कारणों से दिमाग विकसित नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चों का आईक्यू तो सामान्य रहता है लेकिन अन्य शारीरिक गतिविधियां करने में वह सक्षम नहीं होते हैं। एसएमजीएस अस्पताल के वार्ड 17 में विशेष तौर पर ऐसे बच्चों को उपचार दिया जा रहा है। अस्पताल की सामान्य 400 की शिशु ओपीडी में रोजाना दो से चार ऐसे बच्चे आ रहे हैं। इसी तरह शहर के गांधीनगर अस्पताल में भी डीआईसी केंद्र में सेरेब्रल पॉल्सी के पीड़ित बच्चों को इलाज दिया जा रहा है।