जहां तक उमर के व्यक्तित्व की बात करें तो अभी तक तो वे तमाम आरोपों को दरकिनार करते आए हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि संतुलन व असंतुलन के लाभ-हानि पर उन्होंने अब तक लंबा शोध कर लिया है। यही वजह है कि उनकी पाॅलिटिक्स बहुत प्रैक्टिकल हो चुकी है। पार्ट-1 और पार्ट-2 उमर में बहुत अंतर है। 2024 तक आते-आते एक नया इतिहास लिखा जा चुका है। जम्मू-कश्मीर का भौगोलिक परिदृश्य बदल चुका है। उप राज्यपाल के अपने अलग विशेष अधिकार हैं, जबकि उमर सरकार के अपने अधिकार और उसके साथ ही साथ कुछ सीमाएं भी हैं।
देखना रोचक होगा, कैसे साधेंगे संतुलनचुनाव परिणाम और नेकां की जीत ने (भले ही कांग्रेस से गठबंधन रहा हो) ये तो साबित कर दिया कि जम्मू-कश्मीर ने उन्हें अनुच्छेद 370 की वापसी, दरबार मूव और पूर्ण राज्य का दर्जा देने के वादे पर ही चुना है। उमर की तीन प्रमुख दुविधा हैं। पहला केंद्र से संतुलन बनाकर चलना। दूसरा अपने वोटर से जुड़े रहना और तीसरा अपनी टीम के सदस्यों को सुनना।
इस सत्र के दौरान उमर के संतुलन साधने की योग्यता की परीक्षा होगी कि वे किस तरह जनता से किए अपने वादे पूरा करते हैं, अपने सांसदों की सुनते हैं और केंद्र से कैसा रिश्ता रखते हैं, क्योंकि वे न तो जम्हूरियत का विश्वास खोना चाहेंगे और न ही लंबे समय के बाद मिले ताज को सियासी जंग में गंवाना चाहेंगे। उनकी इसी योग्यता के बूते इस सत्र में तय होगा कि उनकी सरकार अगले पांच साल किस दिशा में जाती है। साथ ही सरकार का लाइन ऑफ एक्शन क्या होगा।
भाजपा की चुनौतीः विपक्ष का राजधर्म कैसे निभाएगी
मुख्यमंत्री उमर सरकार की दुविधा और उनसे पार पाने की चुनौतियां इस सत्र को अहम बना रही हैं। ये देखना भी कम रोचक नहीं होगा कि भाजपा कैसे अपने राजधर्म का पालन कर पाएगी। आमतौर पर विपक्ष का नजरिया उप राज्यपाल के भाषण पर आलोचनात्मक रहता है, विरोध का रहता है। अब चूंकि उप राज्यपाल की पृष्ठभूमि भारतीय जनता पार्टी की है, विपक्ष में भाजपा है। एलजी के भाषण पर उसका रवैया कैसा रहेगा, यह भी देखने वाली बात होगी।
सरकार चलाने के लिए विवेक का इस्तेमाल करना होगाकेंद्रशासित प्रदेश की सरकारें आपसी सहमति से ही चला करती हैं। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में सुरक्षा-कानून-व्यवस्था का मुद्दा अहम है। जब भी बात राज्य की सुरक्षा की होगी, उसमें केंद्र व एलजी की सलाह मानना ही उचित होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो हालात फिर पहले जैसे हो जाएंगे।
मुख्यमंत्री को इस मुद्दे पर केंद्र व एलजी की सलाह का सम्मान करना चाहिए। तकरार के रवैये को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए। मुख्यमंत्री को भी सरकार चलाने के लिए विवेक का इस्तेमाल करना होगा। सरकार को ये देखना होगा कि राज्य में हिंसा खत्म हो, भेदभाव कम हो। किसी भी कीमत पर आपसी वैमनस्यता को खत्म करना होगा। संविधान में दिए गए आधुनिक राज्य के सिद्धांतों पर आगे बढ़ना होगा।