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Jammu Kashmir: उमर अब्दुल्ला का पहला इम्तिहान, विधानसभा सत्र में क्या होगा खास?

Mon, 04 Nov 2024 03:49 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

जम्मू-कश्मीर की पहली निर्वाचित सरकार का पहला विधानसभा सत्र श्रीनगर में शुरू, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने केंद्र से संतुलन बनाने और अपने वोटर्स की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती।
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उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर - फोटो : X / @OmarAbdullah
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विस्तार
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छह साल के लंबे इंतजार के बाद यूटी की पहली निर्वाचित सरकार का पहला विधानसभा सत्र सोमवार से श्रीनगर में शुरू हो रहा है। जिस तरह 10 साल बाद हुए चुनाव के नतीजों पर सभी की निगाहें थीं, उसी तरह चार दिनों तक चलने वाले सत्र पर भी टिकी हैं। जम्मू-कश्मीर के विशेष हालात, नेशनल कांफ्रेंस के चुनावी वादे और उप राज्यपाल की विशेष कार्यकारी शक्तियों के बीच संतुलन साधने की चुनौती मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने होगी। बीते कुछ समय से जम्मू-कश्मीर के सियासी परिदृश्य में जिस तरह उतार-चढ़ाव और हलचल दिख रही है, बयानबाजी हो रही है, वो इसका भी संकेत है कि ये महज सत्र नहीं, बल्कि अगले चार दिन नेकां लीडर के लिए परीक्षा की घड़ी भी होगी।

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उमर सरकार के शपथ लेने के साथ ही सियासी हलकों में उनका बयान सुर्खियों में था, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार जताते हुए कहा था कि मैं और मेरे सहयोगी आपके साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। इसी बीच जब वे नई दिल्ली में पीएम, गृहमंत्री व अन्य से मिलकर लौटे तो भी उन्होंने केंद्र से दो-दो हाथ के बजाय, हाथ मिलाकर सरकार चलाने का संकेत दिया।

पर अगले ही पल हालात अचानक बदले। केंद्र से मिलकर काम करने के संकेतों के बीच सियासी माहौल बदला सा दिखने लगा। इधर, नेकां के सांसद आगा रुहुल्लाह ने सीएम को पत्र लिखकर प्राथमिकताएं गिनाईं, उधर, उमर सरकार ने समान शैक्षिक सत्र के एलजी के फैसले को ही पलट दिया। अभी लोग कुछ समझ पाते कि यूटी स्थापना दिवस समारोह का बहिष्कार कर दिया गया। साथ मिलकर चलने के कयास धरे रह गए और फिर से तकरार और टकराहट की आशंकाएं पैदा हो गईं।सरकार उमर की, पर अधिकार के साथ सीमाएं भी हैं

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जहां तक उमर के व्यक्तित्व की बात करें तो अभी तक तो वे तमाम आरोपों को दरकिनार करते आए हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि संतुलन व असंतुलन के लाभ-हानि पर उन्होंने अब तक लंबा शोध कर लिया है। यही वजह है कि उनकी पाॅलिटिक्स बहुत प्रैक्टिकल हो चुकी है। पार्ट-1 और पार्ट-2 उमर में बहुत अंतर है। 2024 तक आते-आते एक नया इतिहास लिखा जा चुका है। जम्मू-कश्मीर का भौगोलिक परिदृश्य बदल चुका है। उप राज्यपाल के अपने अलग विशेष अधिकार हैं, जबकि उमर सरकार के अपने अधिकार और उसके साथ ही साथ कुछ सीमाएं भी हैं।

देखना रोचक होगा, कैसे साधेंगे संतुलनचुनाव परिणाम और नेकां की जीत ने (भले ही कांग्रेस से गठबंधन रहा हो) ये तो साबित कर दिया कि जम्मू-कश्मीर ने उन्हें अनुच्छेद 370 की वापसी, दरबार मूव और पूर्ण राज्य का दर्जा देने के वादे पर ही चुना है। उमर की तीन प्रमुख दुविधा हैं। पहला केंद्र से संतुलन बनाकर चलना। दूसरा अपने वोटर से जुड़े रहना और तीसरा अपनी टीम के सदस्यों को सुनना।

इस सत्र के दौरान उमर के संतुलन साधने की योग्यता की परीक्षा होगी कि वे किस तरह जनता से किए अपने वादे पूरा करते हैं, अपने सांसदों की सुनते हैं और केंद्र से कैसा रिश्ता रखते हैं, क्योंकि वे न तो जम्हूरियत का विश्वास खोना चाहेंगे और न ही लंबे समय के बाद मिले ताज को सियासी जंग में गंवाना चाहेंगे। उनकी इसी योग्यता के बूते इस सत्र में तय होगा कि उनकी सरकार अगले पांच साल किस दिशा में जाती है। साथ ही सरकार का लाइन ऑफ एक्शन क्या होगा।
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भाजपा की चुनौतीः विपक्ष का राजधर्म कैसे निभाएगी
मुख्यमंत्री उमर सरकार की दुविधा और उनसे पार पाने की चुनौतियां इस सत्र को अहम बना रही हैं। ये देखना भी कम रोचक नहीं होगा कि भाजपा कैसे अपने राजधर्म का पालन कर पाएगी। आमतौर पर विपक्ष का नजरिया उप राज्यपाल के भाषण पर आलोचनात्मक रहता है, विरोध का रहता है। अब चूंकि उप राज्यपाल की पृष्ठभूमि भारतीय जनता पार्टी की है, विपक्ष में भाजपा है। एलजी के भाषण पर उसका रवैया कैसा रहेगा, यह भी देखने वाली बात होगी। 

सरकार चलाने के लिए विवेक का इस्तेमाल करना होगाकेंद्रशासित प्रदेश की सरकारें आपसी सहमति से ही चला करती हैं। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में सुरक्षा-कानून-व्यवस्था का मुद्दा अहम है। जब भी बात राज्य की सुरक्षा की होगी, उसमें केंद्र व एलजी की सलाह मानना ही उचित होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो हालात फिर पहले जैसे हो जाएंगे।

मुख्यमंत्री को इस मुद्दे पर केंद्र व एलजी की सलाह का सम्मान करना चाहिए। तकरार के रवैये को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए। मुख्यमंत्री को भी सरकार चलाने के लिए विवेक का इस्तेमाल करना होगा। सरकार को ये देखना होगा कि राज्य में हिंसा खत्म हो, भेदभाव कम हो। किसी भी कीमत पर आपसी वैमनस्यता को खत्म करना होगा। संविधान में दिए गए आधुनिक राज्य के सिद्धांतों पर आगे बढ़ना होगा।
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