दस साल बाद चुनाव और केंद्र शासित प्रदेश का पहला विधान सभा सत्र, वो भी छह साल बाद। जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ वादाखिलाफी का आरोप लगाने वाली पीडीपी ने भी सत्र से जनता के मुद्दों को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। सदन का समय बर्बाद करने के लिए वो भी कम दोषी नहीं। जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग की प्रमुख रहीं प्रोफेसर रेखा चौधरी कहती हैं कि ये जो कुछ हुआ है वो अप्रत्याशित नहीं है। ये तो होना ही था। दरअसल जम्मू-कश्मीर विधान सभा में एक बहुत बड़े वर्ग की सहभागिता भी नहीं है।
हिन्दु बहुल प्रतिनिधियों की भागीदारी नहीं होने से एकतरफा स्थिति है। पीडीपी-बीजेपी की सरकार जब थी, तब भी पहले दिन ही संग्राम शुरू हो गया था। इस सत्र से कुछ हासिल नहीं हुआ। दरअसल, उमर अब्दुल्ला के पास समस्याएं कम नहीं हैं। रशीद इंजीनियर का भाई हो, पीडीपी के तीन सदस्य हों या फिर सज्जाद लोन ये उमर पर अलग तरीके का दबाव बना रहे हैं। दूसरी तरफ बैठे विपक्ष में भी एक-दो सदस्य नहीं बल्कि 28 सदस्य हैं। उमर अब्दुल्ला ने दबाव में आकर प्रस्ताव तो पेश कर दिया, पर वे हर स्थिति में साथ मिलकर आगे बढ़ना चाह रहे हैं।अभिभाषण से जगी थी उम्मीद अंत में टूटी
उपराज्यपाल के अभिभाषण के बाद थोड़ी सी उम्मीद जगी थी कि शायद सत्र जम्मू-कश्मीर के विकास के रोडमैप को लेकर किसी निष्कर्ष पर जाकर समाप्त होगा। पर यहां भी राजनीतिक दलों का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। विधान सभा के पूर्व स्पीकर कविन्दर गुप्ता कहते हैं कि माहौल खराब करने का मन बनाकर ही नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने सत्र की शुरुआत की थी। होना तो चाहिए था कि पक्ष व विपक्ष को सामने बैठाकर बात होती, पर ऐसा होने ही नहीं दिया गया। पहला सत्र था, इसे सौहाद्रपूर्ण तरीके से चलाना चाहिए था। इसकी कोशिश होती कहीं नहीं दिखी।