खंडपीठ ने कहा कि रणथंबोर, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान जैसे स्थानों पर टेंट और अस्थायी ढांचों से इको टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी तर्ज पर डल झील के आसपास भी अस्थायी और पर्यावरण अनुकूल ढांचे बनाए जा सकते हैं।
ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के मास्टर प्लान 2035 में डल झील के लिए प्रस्तावित बफर जोन में नए स्थायी निर्माण को हाईकोर्ट ने नामंजूर कर दिया है। साथ ही हाउसबोट को झील से बाहर जमीन पर लाने का सुझाव भी दिया है।
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सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और न्यायाधीश पुनीत गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि मास्टर प्लान में 200 मीटर दायरे में मनोरंजन पार्क, एक्वेरियम, स्वीमिंग पूल का प्रस्ताव दिया गया है। जबकि अदालत हाउसबोट भी जमीन पर शिफ्ट करने का सुझाव देती है।
डल झील ताज के रत्न की तरह है। इसके संरक्षण से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है। 200 मीटर दायरे को बफर जोन बनाकर यदि पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए स्थायी ढांचे बनाए गए तो इसका झील पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
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पिछले 20 वर्ष से विभाग और एजेंसियों की ओर से किए गए संरक्षण कार्य को मास्टर प्लान के प्रावधानों से व्यर्थ नहीं जाने दिया जा सकता। अदालत ने पिछले आदेश में झील में मौजूदा ढांचों की मरम्मत की अनुमति दी थी। मास्टर प्लान में नए निर्माण क प्रावधान है, जिसे नामंजूर किया जाता है।
खंडपीठ ने कहा कि रणथंबोर, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान जैसे स्थानों पर टेंट और अस्थायी ढांचों से इको टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी तर्ज पर डल झील के आसपास भी अस्थायी और पर्यावरण अनुकूल ढांचे बनाए जा सकते हैं।