रहबर-ए तालीम योजना संबंधी याचिकाओं का निपटारा करते हुए खंडपीठ ने कहा, अदालत की ओर से जो भी आदेश दिए गए हैं, उन्हें कार्यपालिका को अमल में लाना ही होगा।
शिक्षा विभाग में रहबर-ए तालीम योजना रद्द करने के आदेश के बावजूद उन शिक्षकों की नियुक्ति पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिनकी नियुक्ति के लिए पैनल की ओर से प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में न्यायाधीश संजीव कुमार और न्यायाधीश मोक्षा खजूरिया काजमी की खंडपीठ ने इस टिप्पणी के साथ कहा, कार्यपालिका के पास यह अधिकार नहीं है कि वह न्यायालय के आदेश को पलट दे।
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सोमवार को रहबर-ए तालीम योजना संबंधी याचिकाओं का निपटारा करते हुए खंडपीठ ने कहा, अदालत की ओर से जो भी आदेश दिए गए हैं, उन्हें कार्यपालिका को अमल में लाना ही होगा। यह याचिकाएं प्रदेश सरकार के 16 नवंबर 2018 के उस आदेश को लेकर दायर की गई थीं, जिसके तहत रहबर-ए तालीम योजना को प्रशासनिक परिषद के आदेश पर आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया था। सरकार के इस आदेश के तहत योजना को बंद करने के साथ ही उन तमाम अधिसूचनाओं को भी तत्काल वापस ले लिया गया था, जिसमें शिक्षकों के चयन के लिए पैनल बनाए जाने थे या फिर नियुक्ति आदेश जारी नहीं हुए थे।
खंडपीठ ने कहा, सरकार का यह आदेश उन आवेदकों के अधिकार पर असर नहीं डालता, जो नियुक्ति के लिए योग्य घोषित किए गए हैं और उनके मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। लिहाजा इसमें कार्यपालिका को कोर्ट के आदेश पर अमल करना होगा। रहबर-ए तालीम योजना वर्ष 2000 में शुरू की गई थी। इस योजना को शिक्षा विभाग में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए स्थानीय स्तर पर पैनल बनाकर शिक्षक नियुक्ति किए गए। चयन प्रक्रिया के लिए ग्राम स्तर पर जोन बनाए गए। रहबर-ए तालीम योजना के तहत पांच वर्ष तक संतोषजनक सेवाएं देने वाले शिक्षक को स्थायी करने का प्रावधान था।