पाकिस्तान से लगते सीमावर्ती राजोरी-पुंछ के इलाकों में दस साल बाद हो रहे विधानसभा चुनाव में जम्हूरियत का चटख रंग दिखा, जबकि तमाम जतन के बाद भी केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में फिर मतदाताओं का रुझान कम दिखा। 2014 के विधानसभा चुनाव की तुलना में श्रीनगर में कम वोट पड़े। राजोरी (70.95%) व पुंछ (73.80%) में चार महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव का रिकॉर्ड टूट गया। बदले माहौल में जम्मू संभाग के तीन जिलों में कश्मीर की तुलना में अधिक वोटिंग हुई। हालांकि, दूसरे चरण में शामिल सभी छह जिलों में 2014 की तुलना में कम मतदान हुआ है।
पिछले कुछ माह में आतंकी वारदात से प्रभावित राजोरी और पुंछ में सुबह से ही मतदाताओं की लंबी कतारें लगी रहीं। एलओसी से सटे पुंछ के करमाड़ा, मेंढर व राजोरी के नौशेरा के झांगड़ इलाके में उत्साह रहा। राजोरी व पुंछ जिले में पहली बार लोगों को राजनीतिक आरक्षण का लाभ मिला है। यहां की पांच सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित की गई हैं। लोकसभा चुनाव में राजोरी व पुंछ दोनों जिलों में लगभग 67 फीसदी वोटिंग हुई थी। वहीं, श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में 37.99 फीसदी मत पड़े थे।
पहाड़ी समुदाय में आरक्षण का दिखा उत्साह
पहाड़ी नेता व भाजपा के महामंत्री विबोध गुप्ता तथा जम्मू विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर व पुंछ के पहाड़ी नेता डॉ. नितन शर्मा का कहना है कि पहली बार राजनीतिक आरक्षण मिलने से विधानसभा चुनाव में पहाड़ी समुदाय के लोगों में उत्साह रहा। एसटी का दर्जा मिलने से उन्होंने अधिक उत्साह के साथ लोकतंत्र के पर्व में हिस्सा लिया। महिला, पुरुष, बड़े-बुजुर्ग सभी मतदान केंद्रों तक पहुंचे। भीषण गर्मी की परवाह न करते हुए भी मतदाताओं की लंबी लाइन दिखी। उन्होंने भारी मतदान के जरिये पहाड़ी दर्जा मिलने का कर्ज चुकाया।
न बहिष्कार की कॉल, न आतंकी धमकी, फिर भी श्रीनगर में कम रुझान
ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में इस बार न तो बहिष्कार की कॉल थी और न ही आतंकी साया, फिर भी मतदान के प्रति लोगों में कम रुझान दिखा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चिंता का विषय है। नेकां प्रमुख डॉ. फारूक अब्दुल्ला, उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी श्रीनगर में ही रहती हैं। दिग्गज नेताओं की मौजूदगी भी मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ला सकी, तो इसके कारणों पर विचार करना चाहिए, जबकि इस बार बदले माहौल में चुनाव हो रहा है। शांति है, पत्थरबाजी नहीं है, आतंकी घटनाएं नहीं हैं, फिर भी मतदाताओं का खुलकर सामने न आना चिंता का कारण है, जबकि यह लोकसभा नहीं बल्कि विधानसभा का चुनाव है। इसमें अपनी सरकार के लिए मतदाताओं में और अधिक रुचि दिखनी चाहिए थी।