राजोरी जिले में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास एक अग्रिम गांव में मोहम्मद यूसुफ कोहली छह सदस्यों के परिवार के लिए नया घर बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह एक सपना है, जो भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्धविराम के कारण पूरा हो रहा है। सीमा पार से गोलाबारी बंद होने पर सीमावर्ती ग्रामीण अपनी भूमि की देखभाल और मवेशियों को चराने जैसी सामान्य गतिविधियां शांति से कर रहे हैं।
एक अन्य ग्रामीण मोहम्मद नजीर ने कहा कि वह वहां जीवन जीना चाहते थे, जहां गोलीबारी का कोई खतरा न हो, बच्चे स्कूल जाते हों और किसान अपने खेतों में बिना किसी खतरे के काम करते हों। वह अब हो पा रहा है।
उन्होंने कहा कि उस समय वह घरों में सो भी नहीं पाते थे। सरकार को पीने योग्य पानी, अच्छी सड़कों और बिजली सहित बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए विकासात्मक गतिविधियों को शुरू करने के लिए सीमावर्ती गांवों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
रत्ती मिट्टी, चिट्टी बकरी, नैका, चंबा, पंजग्रियां, पेरियाली और अन्य गांवों के निवासी आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उन्हें अच्छे स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र सहित बुनियादी सुविधाएं मिलें।
किसान फारूक अहमद ने कहा कि नियंत्रण रेखा पर बंदूकों की खामोशी एक बड़ी राहत के रूप में आई है। संघर्ष विराम हमेशा के लिए रहना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद युसूफ ने कहा कि दो सालों में संघर्षविराम के कारण हालात काफी सुधरे हैं।
क्षेत्र में हर कोई चाहता है कि यह शांति समझौता जारी रहे। हमने जीने के लिए संघर्ष किया है, और हम भाग्यशाली हैं कि घरों के बहुत करीब दर्जनों गोले गिरने के बावजूद कोई भी गोली या मोर्टार मौत नहीं लाया। गांव में ऐसा कोई घर नहीं है जहां गोली के निशान न हों।