अर्थ शास्त्री वित्त मंत्री डॉ. हसीब द्राबू के समक्ष गंभीर वित्तीय संकट से निजात पाना सबसे बड़ी चुनौती है। नए बजट में उन्हें रियासत की आर्थिक स्थिरता के लिए ठोस उपाय खोजने होंगे। द्राबू रियासत की आत्मनिर्भरता के पक्षधर रहे हैं लेकिन हर मौके पर केंद्र सरकार के सामने हाथ फैलाने की लाचारी का विकल्प ढूंढना आसान नहीं है।
रियासत के आंतरिक संसाधनों के अधिकांश स्रोत सूखे पड़े हैं। मुद्दत से इन स्रोतों को जिंदा करने की कोशिश नहीं हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने 11 बार शून्य घाटे का बजट पेश कर भले ही वाहवाही लूटी हो, लेकिन, इससे रियासत को फायदा होने की बजाए नुकसान ही हुआ।
नए टैक्स लगाने जैसे कठोर निर्णय से द्राबू भी फिलहाल बचना चाहेंगे। नतीजतन वित्त मंत्री के समक्ष तमाम बाधाओं से जूझते हुए रियासत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की चुनौती है।
बजट में देश-दुनिया की आर्थिक दिशा की झलक
वित्त मंत्री द्राबू देश के जाने माने आर्थिक विशेषज्ञ रहे हैं। उनके पास योजना आयोग, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद और 10वें वित्त आयोग के कंसल्टेंट के रूप में काम करने का अनुभव रहा है। वह एशियन डेवलपमेंट बैंक से भी जुड़े रहे हैं।
नतीजतन देश की नई आर्थिक दिशा और जरूरतों का उन्हें अंदाजा है। यही वजह है कि द्राबू इस बार जम्मू कश्मीर के 2015-16 के बजट में देश-दुनिया की आर्थिक दिशा की झलक को शुमार करना चाहते हैं।
वह जम्मू कश्मीर और यहां के निवासियों को गरिमा को कायम रखते हुए आर्थिक संकट से मुकाबले का नुस्खा खोज रहे हैं। आर्थिक स्थिरता से अमन बहाली को कोशिशों को गति देने की बात सुनने में तो अच्छी लगती है, लेकिन, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए द्राबू को लीक से हटकर कदम उठाने होंगे।
इस बार वित्त मंत्री केंद्रीय मदद की सच्चाई भी बताएंगे। इसमें वह ब्योरा शामिल होगा कि रियासत सरकार ने कब कितनी मांग की और उसके एवज में उसे वास्तव में क्या मिला? यह विवरण श्वेत पत्र और बजट भाषण का हिस्सा हो सकता है।
लगभग 50 हजार करोड़ का हो सकता है बजट
नया बजट लगभग 50 हजार करोड़ का हो सकता है। इसमें आमदनी और खर्च के बीच संतुलन कायम करने में वित्त मंत्री द्राबू की अग्निपरीक्षा होगी। पूर्व वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने पिछली बार 43 हजार 543 करोड़ का बजट पेश किया था।
उसमें कोई नया टैक्स नहीं था और बजट में घाटा शून्य दिखाया गया। लेकिन बाद में वित्तीय संतुलन चरमरा गया। रियासत ने आर्थिक संकट का वह मंजर देखा जिसमें कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए भी वित्त महकमे को मानसिक रूप से पापड़ बेलने पड़े।
आर्थिक स्थिति पर श्वेत पत्र और बजट भाषण में उमर अब्दुल्ला सरकार की अदूरदर्शिता पर हमले हो सकते हैं। वित्तीय अव्यवस्था को वर्तमान आर्थिक संकट के लिए जिम्मदेरा ठहराने का होमवर्क पूरा हो चुका है।