गोरखा समाज के अर्जुन सिंह कहते हैं, जम्मू-कश्मीर में भाषा की सबसे अधिक समस्या थी। सरकारी कार्यालयों में उर्दू अधिकारिक भाषा होने सेे समझ नहीं पाते थे। अब केंद्र शासित प्रदेश में हिंदी में सरकारी कामकाज हाेंगे जो अच्छा है। महाराजा रणजीत सिंह के शासन काल में हमारे पूर्वज सेना में थे। हमने सेवा तो की लेकिन अधिकार नहीं मिले।
जनक बहादुर के मुताबिक शिक्षा का अधिकार तो था, लेकिन स्टेट सब्जेक्ट नहीं होने से बच्चों को नौकरी नहीं मिलती थी। मेरे पिता जी को पीएचई विभाग में इसलिए नौकरी नहीं मिली क्योंकि उनके पास स्टेट सब्जेक्ट नहीं था। पूर्व की सरकारों ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, अब हमें उम्मीद जगी है।
वाल्मीकि समाज के करतार सिंह के मुताबिक 1952 और 1993 में हमारे पूर्वज पंजाब से जम्मू-कश्मीर आए थे। उस समय तो हमें कहा गया था कि हमें सभी नागरिकता अधिकार मिलेंगे, लेकिन कुछ नहीं मिला। बलकार सिंह ने कहा, अभी तक तो हमें झाडू मारने वाले तक सीमित रखा गया है। हमारे बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिलती।
बुआ सिंह कहते हैं, बेटे को नौकरी मिली थी, लेकिन स्टेट सब्जेक्ट नहीं होने से नियुक्ति नहीं हो पाई। हमारे बच्चे हाई सेकेंडरी के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए उनके पास जरूरी सरकारी प्रमाणपत्र नहीं होते हैं। अब हमें हमारे अधिकार मिलेंगे। राजू अठवाल के मुताबिक नगर निगम में सफाई कर्मचारी की नौकरी के अलावा हमारे बच्चों को किसी अन्य विभाग में नौकरी मिलना मुश्किल था। लेकिन अब हमें अपने अधिकार मिलेंगे।