भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा नब्बे के दशक से ही घुसपैठ को लेकर संवेदनशील रही है। पिछले तीन दशक में पाकिस्तान ने हर बार पैंतरे बदलकर घुसपैठ करवाने की कोशिशें की हैं। तीन दशक के बीच सीमा पर नदी नालों से फिर तारबंदी को काटकर और उसके बाद सुरंगों के जरिए घुसपैठ की गई। अब आसमान के रास्ते हो रही घुसपैठ सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।
सुरक्षा एजेंसियां छिटपुट आतंकी वारदातों के बीच बड़े मामलों को विफल करने में लगातार जुटी हुई हैं लेकिन ड्रोन खतरे के जून 2020 में पहले बार सामने आने के लगभग सवा दो साल के बाद भी सुरक्षा एजेंसियों के पास इसका तोड़ सामने नहीं आ रहा है। वारदात होने के बाद ह्यूमन इंटेलिजेंस के जरिए ही वर्तमान में ड्रोन गतिविधियों की जानकारी मिल पा रही है। जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को जिंदा रखने के लिए पाकिस्तान ने हर संभव प्रयास पिछले 32 वर्षों में किया है। शुरूआती दौर में हीरानगर और सांबा सेक्टर के दरियाई नालों का प्रयोग कर खुले रास्तों से घुसपैठ की जाती रही।
इसके बाद कठुआ और उधमपुर जिले के पहाड़ी इलाकों को पार कर आतंकी तय रूट से घाटी तक पहुंचते रहे। दशक भर बाद सख्ती बढ़ी तो वर्ष 2002 में विधानसभा चुनाव से पहले आतंकियों ने हीरानगर में फिदायीन हमले के साथ अपनी बदली हुई रणनीति साफ कर दी। इसके बाद तारबंदी काटकर तो कभी अज्ञात रास्तों से घुसपैठ कर सुरक्षा संस्थानों को निशाना बनाया जाता रहा।
हीरानगर पुलिस थाने, राजबाग पुलिस थाने समेत जंगलोट सैन्य क्षेत्र और सांबा सैन्य क्षेत्र को भी आतंकियों ने निशाना बनाया जिन्हें सुरक्षाबलों ने ढेर कर दिया। पाकिस्तान ने वर्ष 2016 में राजबाग पुलिस थाने पर फिदायीन हमले के बाद से अपनी रणनीति फिर बदल ली। अब आतंकियों की घुसपैठ सुरंगों के रास्ते करवाई जाने लगी। फिर आतंकियों ने हीरानगर और सांबा सेक्टर को अपना सेफ रूट बना लिया। अब हाईवे तक पहुंचकर ट्रकों के जरिए कश्मीर पहुंचने का नया तरीका अपनाया गया लेकिन झज्जर कोटली, बन्न टोल प्लाजा पर हुए इनकाउंटरों में इसका खुलासा हो गया।
2020 के जून महीने में पाकिस्तान ने चीनी ड्रोन की मदद से घुसपैठ का नया तरीका खोजा। इस बार मानव घुसपैठ की जगह पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाकों में स्लीपर सेल एक बार फिर सक्रिय कर दिए हैं। जिन्हें सोशल मीडिया के जरिए संचालित किया जा रहा है। बिना हथियारों के इनकी मूवमेंट भी संदेह में नहीं आती। स्लीपर सेल को पाकिस्तान ने ड्रोन से गिराए जाने वाले मादक पदार्थों और हथियारों की खेप कश्मीर घाटी तक पहुंचाने का जरिया बना लिया।
स्टिकी बम के जरिए इन स्लीपर सेल का ब्रेन वॉश कर अब इन्हें कश्मीर में पूर्व में होने वाले ग्रेनेड हमलों की तरह स्टिकी बम हमले करने के लिए तैयार किया जा रहा है। लेकिन इस सब के बीच आसमान के रास्ते लगातार हीरानगर और सांबा सेक्टर से पहुंच रही हथियारों की खेप को नियंत्रित या निष्क्रिय करने की व्यवस्था का अभाव भी सामने आ रहा है।