फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Jammu Result: कश्मीर में नेकां... जम्मू में भाजपा की बादशाहत; अलग-अलग मुद्दों और प्राथमिकताओं पर बंटी सियासत

Wed, 09 Oct 2024 12:57 PM IST
शाहरुख खान राहुल दुबे, अमर उजाला, जम्मू
विज्ञापन
Jammu Election - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
दस साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इस बार जब चुनाव का एलान हुआ तो लगा बहुत कुछ बदला हुआ नजर आएगा। एक नई बयार जम्मू व कश्मीर दोनों संभाग में देखने को मिलेगी। फिलहाल ऐसा कुछ नहीं दिखा। चुनाव प्रचार, मुद्दे, रणनीति, प्रत्याशी, स्टार प्रचारक यह सबकुछ पहले दिन से दो हिस्सों में बंटकर चल रहा था। जम्मू और कश्मीर। 
विज्ञापन


दोनों जगह के मुद्दे अलग थे। यहां प्रचार करने का तरीका जुदा था तो नतीजे भी अलग और एकदम साफ सियासी संदेश के साथ आए। घाटी ने साफ किया वह किसी भी हाल में भाजपा के साथ या उसके साथ दिखने वाले किसी भी दल या व्यक्ति के साथ नहीं जाएगी तो जम्मू ने भाजपा की ताकत बढ़ाकर अपने इरादे साफ कर दिए। मैदान बनाम पहाड़ की लड़ाई वैसी ही रही।

जम्मू में भाजपा की पकड़ हुई मजबूत, नेकां ने छोड़ी छाप, पीडीपी का सफाया
जम्मू-कश्मीर में अब तक हुए सभी चुनावों पर गौर करें तो कश्मीर में हमेशा नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी का वर्चस्व दिखता रहा है। वहीं, जम्मू के मैदानी इलाकों में 1987 में भगवा पार्टी का प्रभुत्व शुरू हुआ और 2014 तक आते-आते लगभग जम्मू संभाग पर छा गया। 
विज्ञापन


इस बार के चुनाव में उम्मीद जताई जा रही थी कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की जनता एकतरफा फैसला सुनाएगी। हुआ भी कुछ ऐसा ही, जम्मू ने भी एकतरफा फैसला भाजपा के पक्ष में सुनाया और कश्मीर ने नेकां के पक्ष में। 

वहीं, जम्मू संभाग में नेकां ने भी छाप छोड़ी और पांच सीटें जीतने में सफल रही। जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक सीट ही जम्मू संभाग से मिली। हालांकि जम्मू में निर्दलीयों ने भाजपा की बढ़त पर रोक लगा दी। 2014 के चुनाव में भाजपा ने जम्मू संभाग में 25 सीटों पर जीत हासिल की थी और इस बार 29 सीटों पर भगवा लहराया। 

 

इससे जम्मू ने सियासी संदेश एकदम स्पष्ट रखा कि वह भाजपा के साथ ही जाएगी। वरिष्ठ पत्रकार दीपक कहते हैं कि 28 सितंबर को जम्मू में चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि पहली बार जम्मू के लोगों की सरकार बनने जा रही है। भाजपा की भी पहली पूर्ण बहुमत की सरकार होगी। उसी दिन से भाजपा के पक्ष में जम्मू और मजबूती से खड़ा हो गया इस उम्मीद के साथ कि शायद इस राज्य में पहला हिंदू मुख्यमंत्री मिल जाए। 

 

भाजपा ने चुनाव के पहले दिन से ही जम्मू पर मुख्य फोकस रखा। यहां करीब दो दशक से भाजपा का असर बरकरार है और हर चुनाव में बढ़ रहा है। 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उनका दबदबा रहा। 

 

वहीं बीते दस सालों में कांग्रेस के साथ-साथ पीडीपी, नेकां व बाकी दलों की कमजोर इस संभाग से कम होती चली गई। जम्मू को हिंदू-बहुल माना जाता है। हालांकि पांच जिले डोडा, पुंछ, राजोरी, किश्तवाड़ और रामबन यह मुस्लिम बहुल हैं। यहां किश्तवाड़ सीट को छोड़कर भाजपा बहुत मजबूती से पकड़ बनाती नहीं दिखी। इन जिलों की सीटों पर भी पार्टी पकड़ बना पाती तो तस्वीर अलग हो सकती थी।

मंदिरों के जीर्णोद्धार का वादा, अनुच्छेद 370 के मुद्दे से भाजपा के पक्ष में बना माहौल
भाजपा ने संकल्प पत्र में राज्य के प्रमुख मंदिरों के जीर्णोद्धार की बात कही और चुनाव प्रचार में उसे प्रमुखता से रखा। भाजपा ने संकल्प पत्र में कश्मीर को ऋषि कश्यप की भूमि कहे जाने की तर्ज पर तीर्थ पुनरूद्धार अभियान चलाने की बात कही। इसके तहत 100 खंडहर हो चुके मंदिरों के जीर्णोद्धार के साथ ही कश्मीर का शंकराचार्य मंदिर, जम्मू का रघुनाथ मंदिर और मार्तंड सूर्य मंदिर को विश्व पटल पर चमकाने का वादा किया। 

 

लंबे समय से अलगाववाद-आतंकवाद का दंश झेल रहे राज्य के हिंदू समुदाय ने इसे लेकर एकतरफा वोट किया। वहीं अनुच्छेद 370 का जम्मू के लोग पहले भी समर्थन करते रहे हैं और इसके हटने पर भी जम्मू में जश्न हुआ था। राजनीतिक विश्लेषक रेखा चौधरी भाजपा की जम्मू में मजबूत हुई स्थिति को इससे जोड़कर देखती हैं।
 

डोगरा समाज को भाजपा एकजुट करने में सफल रही
जम्मू-कश्मीर के अंतिम डोगरा महाराजा हरि सिंह की जयंती पर अवकाश घोषित करने की डोगरा संगठनों की मांग लंबे समय से चली आ रही थी। भाजपा ने इस मांग को मान लिया और उनकी जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर डोगरा समाज को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट करने का माहौल तैयार किया।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू संभाग में होने वाली हर रैली में राजा हरि सिंह का नाम लेकर कांग्रेस पर हमला बोला। पीएम ने कटड़ा की रैली में कहा था कि कांग्रेसियों की हिम्मत देखिए डोगरा की जमीन पर खड़े होकर उन्हीं के खिलाफ बोल रहे हैं। भाजपा ने डोगरा विरासत को सम्मान दिया है। इस दांव को भी भाजपा की जम्मू में मजबूत हुई सियासी जमीन के तौर पर देखा जा रहा है।
 

परिवारवाद-पाकिस्तानी मुद्दे सिर्फ जम्मू में सफल दिखे
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस का पाकिस्तानी कनेक्शन को मुद्दा बनाया। कहा कि जो पाकिस्तान चाहता है वही इनकी नीतियां हैं। अब्दुल्ला और गांधी परिवार पर परिवारवाद की राजनीति करने का आरोप लगाया। लेकिन, यह सभी मुद्दे सिर्फ जम्मू में प्रभावी दिखे और जम्मू से नेकां साफ हो गई। कांग्रेस भी सिर्फ एक सीट जीतने में सफल हुई और भाजपा की ताकत भी बढ़ गई लेकिन घाटी में इसका कोई असर नहीं दिखाई दिया। यानि साफ है कि जिन मुद्दों ने घाटी में काम किया उन्होंने जम्मू में नहीं और जम्मू के मुद्दे घाटी में प्रभाव नहीं छोड़ सके।

कश्मीर : अलगाववाद-आतंकवाद, पत्थरबाजों पर कार्रवाई का स्वागत, लेकिन अनुच्छेद 370 पर एकजुट
भाजपा ने नया कश्मीर का नारा दिया। इसमें सुरक्षा की बात कही गई। समय-समय पर आतंकवाद पर होने वाली कार्रवाई के आंकड़े जारी किए गए। सरकार की ओर से आतंकवाद, अलगाववाद और पत्थरबाजी के खिलाफ हुई कार्रवाई का लोगों ने स्वागत किया। उन्होंने माना कि इससे घाटी में अमन और शांति लौट आई लेकिन एक बड़ा तबका यह भी मानता रहा कि उनकी आजादी को दबाया जा रहा है। 
 

खासकर अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से भाजपा के खिलाफ जबरदस्त माहौल बना जो इस चुनाव के नतीजे क रूप में सामने आ गया। वरिष्ठ पत्रकार जफर इकबाल कहते हैं कि घाटी का परिणाम अनुच्छेद 370 के खिलाफ आया है। वहां की अवाम आज भी 370 को वापस लाने की मांग उठा रही है, भले प्रदर्शन नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में चुनाव हुए और विकल्प के रूप में उन्होंने नेकां को चुना। नेकां समेत जो भी दल घाटी में प्रचार कर रहे थे उन्होंने शुरू से ही सिर्फ एक मुद्दे को पकड़ रखा था कि वह हर हाल में 370 को वापस लाएंगे।
 

35ए को दोबारा लागू करेंगे और नौजवानों की रिहाई कराएंगे। ऐसे में घाटी के लोगों के सामने बड़ी पार्टी के रूप में नेकां ही दिख रही थी। वोट भी नेकां के पक्ष में जाते रहे। इसका एक बड़ा कारण नेकां के साथ कांग्रेस का होना माना गया। कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होने का लाभ नेकां को मिला। लोगों ने इसी उम्मीद में वोट किया कांग्रेस केंद्र की सत्ता में होगी तो 370 की बहाली करा देगी। वहीं दूसरी ओर पहाड़ी समुदाय को आरक्षण का लाभ देने का भी फायदा भाजपा को नहीं मिलता दिखा।

भाजपा विकास नहीं समझा पाई
भाजपा ने अनुच्छेद 370, 35ए हटाने के साथ ही नया कश्मीर का नारा दिया। पार्टी ने घाटी में घर-घर अभियान शुरू किया और कार्यकर्ताओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि इससे राज्य के विकास के नए रास्ते खुलेंगे। अनुच्छेद हटने से बाहर के लोग भी आकर नौकरी कर सकेंगे, यहां फैक्टरी लगेगी तो रोजगार के नए अवसर तैयार होंगे। इससे घाटी में विकास बढ़ेगा। लोगों का आवागमन शुरू होगा तो पर्यटन को भी लाभ मिलेगा। हालांकि यह अभियान सफल नहीं रहा जबकि दूसरी ओर नेकां के उमर अब्दुल्ला का पूरा फोकस ही इसी पर रहा कि अनुच्छेद हटने से कश्मीरियों की आवाज दबा दी गई। उनकी नौकरियां छीन ली गईं और उनकी जमीनों पर अब बाहरी कब्जे करेंगे। कश्मीर अब सिर्फ कश्मीरियों का नहीं रहेगा, बल्कि यहां सब आकर कब्जा कर लेंगे। इसका फायदा नेकां को साफतौर पर मिला।

पूर्ण राज्य का दर्जा छिनना खुद का अपमान समझ लिया
जम्मू कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा छिनना भी इस चुनाव में मुद्दा बना। यह इतना महत्वपूर्ण हो गया कि अंतिम चरण तक आते-आते पीएम को भी कहना भी पड़ा कि भाजपा पूर्ण राज्य का दर्जा वापस करेगी। लोगों ने इसे खुद का अपमान करके जोड़ा। सोपोर के क्लॉक टॉवर मार्केट के कपड़ा कारोबारी अब्दुल रज्जाक कहते हैं कि राज्य का दर्जा छिनना, अनुच्छेद का हटना आप ऐसे मानों कि मेरी किसी ने व्यक्तिगत बेइज्जती कर दी है।
 

इंजीनियर रशीद, अल्ताफ बुखारी, जमात को भाजपा की बी टीम बताने में सफल रहा गठबंधन
इंजीनियर रशीद की रिहाई के दिन से ही पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उन्हें भाजपा की बी टीम बता दिया। हर रैली में वह उन पर हमलावर रहे। उन्होंने लोगों को समझाना शुरू किया कि इंजीनियर घाटी के लोगों की भलाई के लिए काम नहीं कर रहे हैं बल्कि भाजपा की बी टीम बनकर वोट काटेंगे और बाद में खुद भाजपा को समर्थन दे देंगे। इसी अल्ताफ बुखारी की पार्टी अपनी पार्टी और जमात के लोगों को भी भाजपा का हिस्सा बताने में कामयाबी हासिल कर ली। नतीजा कश्मीर में इन सभी का सफाया हो गया। सिर्फ लंगेट विधानसभा जहां से सांसद इंजीनियर रशीद के भाई खुर्शीद चुनाव लड़ रहे थे, उन्हें छोड़कर कोई अन्य नहीं जीत सका। जबकि इंजीनियर रशीद ने 2024 के लोकसभा में उमर अब्दुल्ला को चुनाव हराया था।

कश्मीर में आधार ही नहीं था, सिर्फ 19 सीटों पर उतार पाई प्रत्याशी
कश्मीर घाटी की 47 सीटों पर भाजपा ने सिर्फ 19 उम्मीदवार ही खड़े किए थे। यानि की 28 सीटों पर चुनाव ही नहीं लड़ रही थी। कश्मीर की चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि घाटी में अमन शांति लौट आई और भाजपा के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है। उसके बाद भी सवाल उठते रहे कि भाजपा फिर आधी सीटों पर प्रत्याशी क्यों नहीं उतार सकी। एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि दरअसल भाजपा के पास कश्मीर में कोई जमीन ही नहीं थी लेकिन वह सिर्फ वहां अपनी मौजूदगी दिखाने को लड़ रहे थे जो चुनाव के नतीजों के साथ साफ हो गई।
 
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें