अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अपने डोक पलौड़ा प्रवास पर श्रद्धालुओं के बीच अध्यात्म संवाद करते हुए उनके पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देकर मन की शंकाओं को दूर किया।
शंकराचार्य ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि भगवान में स्वरूप, प्रभाव व स्वभाव तीनों निहित है। जय घोष का असली अर्थ यही है कि जहां धर्म है वहीं जय है।
उन्होंने श्रद्धालुओं के प्रश्नों के उत्तर दिए। इसमें धर्म, अध्यात्म और गृहस्थ से जुड़े प्रश्न थे। असाध्य रोगों को कैसे दूर रख सकते हैं पर शंकराचार्य ने कहा कि इसके लिए मात्र गोविंदाय नम: का जाप करते रहना है। धनवंतरि भगवान का जप भी श्रेष्ठ हो सकता है। शंकराचार्य ने कहा कि अध्यात्म के प्रति रुचि कैसे बढ़े इसके लिए अधिकार व रुचि के बीच तालमेल जरूरी है।
एक प्रश्न के उत्तर में शंकराचार्य बोले, जयघोष का अर्थ जहां धर्म वहीं जय है। प्रसंग सुनाया कि किस जब कौरवों व पांडवों की सेनाएं महाभारत युद्ध में कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने सामने खड़ी थीं। वहां पर कौरवों की तरफ से मौजूद भीष्म, द्रोणाचार्य लगातार धर्मात्मा पांडवों की जय का जयघोष कर रहे थे।
यही असली धर्म है, इसे लेकर दुर्योधन को उनकी माता गांधारी ने भी बताया था। गांधारी ने कहा था कि धर्म का प्रभाव तो पड़ता ही है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।
डोक पलौड़ा में श्रद्धालुओं के बीच धर्म व अध्यात्म को लेकर चर्चा करते मठ पुरी के शंकराचार्य स्वा