देश भर में पनबिजली उत्पादन क्षमता के लिहाज से अग्रणी राज्यों में शुमार जम्मू-कश्मीर के एनर्जी सेक्टर को अब केंद्रीय फंडिंग के इंजन से रफ्तार मिलेगी। जम्मू-कश्मीर विद्युत विकास विभाग और जम्मू-कश्मीर स्टेट पावर डेवलपमेंट कारपोरेशन (जेकेएसपीडीसी) के पुनर्गठन का आदेश पहले ही जारी हो चुका है। यूटी बनने पर पुनर्गठन के प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएंगे।
इससे बिजली चोरी रोकने, प्राथमिकताओं पर काम तेज होने से पारदर्शिता में सुधार होगा। बिजली सुधार कार्यक्रम न होने की वजह से केंद्र की फंडिंग भी रुकी थी। विभाग के पुनर्गठन से एक ही झटके में व्यापक सुधार की नींव रखी जा चुकी है। इससे कामकाज में सुधार के साथ केंद्रीय फंडिंग के द्वार भी खुल जाएंगे।
दरअसल, जम्मू-कश्मीर राज्य में पनबिजली तैयार करने की कुल 20 हजार मेगावाट तक की क्षमता है। इसमें से 16 हजार से ज्यादा मेगावाट क्षमता की पहचान की जा चुकी है। इसकी तुलना में जम्मू-कश्मीर केंद्रीय और राज्य की परियोजनाओं से बमुश्किल 3300 मेगावाट बिजली ही तैयार कर पा रहा है। क्षमता के लिहाज से यह करीब 15 फीसदी बिजली ही बन पा रही है।
हालांकि लद्दाख के अलग यूटी बनने से अब जम्मू-कश्मीर में 16 हजार मेगावाट की पनबिजली तैयार करने की क्षमता ही रह जाएगी। जेकेएसपीडीसी के उच्च पदस्थ अधिकारी के अनुसार प्रदेश सरकार को केंद्रीय सरकार की ओर से बिजली सुधार और कार्य के लिए सुगम माहौल तैयार करने के निर्देश दिए जाते रहे हैं, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप सुधार नहीं हुए। यूटी बनने पर अर्थव्यवस्था के लिहाज से सबसे बड़ा बदलाव विद्युत उत्पादन क्षेत्र में देखने को मिलेगा।
इस वजह से था सुस्ती का आलम
जम्मू-कश्मीर में जेकेएसपीडीसी की 22, एनएचपीसी की 7 और निजी क्षेत्र की चार बिजली परियोजनाएं चल रही हैं। अनुच्छेद 370 की वजह से केंद्रीय निगम एनएचपीसी को काम करने का खुला हाथ नहीं था। यहां तक कि एनएचपीसी के अधीन चल रहीं बिजली परियोजनाआें को वापस राज्य को देने की मांग सरकारी स्तर पर उठाई जाती रही। इसके चलते एनएचपीसी की ओर से नई परियोजनाओं में रुझान कम हुआ।
नहीं हो पाती थी बोर्ड की बैठक
जेकेएसपीडीसी की ओर से अहम फैसले लेने के लिए बोर्ड बैठक की जरूरत होती है। कायदे से हर माह में एक बैठक का होना जरूरी होता है। लेकिन कई मर्तबा तो दो वर्ष तक बोर्ड की कोई बैठक नहीं हो पाई। ऐसे में नई बिजली परियोजनाओं पर फैसले अटके रहे। राज्य पुनर्गठन के साथ बिजली महकमे का भी पुनर्गठन कर दिया गया है। बोर्ड का अध्यक्ष महकमे के सचिव को दिया गया है। अब बोर्ड बैठक का आयोजन और परियोजनाओं को मंजूरी देना आसान हो जाएगा।
हिमाचल कर रहा दोहन, जम्मू-कश्मीर पिछड़ा
हिमालयी राज्य होने की वजह से हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में जलसंसाधन की भरमार है। जम्मू-कश्मीर में पनबिजली उत्पादन की कुल क्षमता 20 हजार मेगावाट है लेकिन दोहन के मामले में मुश्किल से 15 फीसदी पर ही काम हो पाया है। वहीं हिमाचल प्रदेश में करीब साढ़े 27 हजार मेगावाट पनबिजली बनाने की क्षमता है जिसमें से हिमाचल क्षमता का एक तिहाई से ज्यादा की बिजली बनाकर अन्य राज्यों को बेच रहा है।
केंद्र की पहले से थी नजर
विद्युत उत्पादन की बड़ी संभावनाओं वाले राज्य जम्मू-कश्मीर पर केंद्र की पहले से नजर रही है। देशभर में सबसे बड़ी परियोजनाओं में शुमार सावलाकोट प्रोजेक्ट (1856 मेगावाट) विचाराधीन है। इसकी डीपीआर भी तैयार हो चुकी है। केंद्र की ओर से कई बार प्रदेश सरकार को इस परियोजना को अपने अधीन लेने के प्रस्ताव दिए जा चुके हैं लेकिन प्रदेश सरकार बीस वर्ष से अधर में लटकी इस बड़ी परियोजना को देने के लिए तैयार नहीं हुई। यूटी बनने पर सावलाकोट समेत रतले (850 मेगावाट) और अन्य कई परियोजनाएं सीधे केंद्र के अधीन हो जाएंगी।
पाकिस्तान का पानी रोकना होगा आसान
सिंधु जल समझौते के अनुसार भारत के सौ फीसदी नियंत्रण वाले नदी नालों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकना अब आसान हो जाएगा। कठुआ जिले के उज्ज दरिया में प्रस्तावित 180 मेगावाट क्षमता वाली बहुद्देशीय पनबिजली परियोजना पहले से ही केंद्र की प्राथमिकता है। लेकिन यह प्रोजेक्ट पहले प्रदेश सरकार का था, जिससे इसके क्रियान्वयन में अड़चनें आती रहीं। इस दरिया का लगभग सारा पानी पाकिस्तान चला जाता है। बहुद्देशीय परियोजना के मूर्त रूप लेने से पानी को जम्मू-कश्मीर समेत अन्य राज्यों में सप्लाई किया जाएगा। इसके लिए पहले से योजना विचाराधीन है।