पंजाबी और गोजरी भी जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषा बनेगी। विधानसभा के बजट सत्र में विधेयक पेश होगा। सिख संगत ने आंदोलन वापस ले लिया है। जम्मू में महाराजा हरी सिंह की प्रतिमा स्थल पर चल रहा पंजाबी भाषा मोर्चा बुधवार को समाप्त हो गया।
जम्मू-कश्मीर में पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन आखिरकार 14 दिनों बाद समाप्त हो गया। नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के कोषाध्यक्ष एवं सांसद गुरविंदर सिंह ओबेरॉय और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सलाहकार नासिर असलम वानी के साथ बुधवार को हुई वार्ता से जीत और जश्न की राह निकली।
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इसके बाद सरकार की ओर से लिखित आश्वासन दिया गया कि आगामी बजट सत्र में पंजाबी और गोजरी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने का प्रस्ताव सदन में लाया जाएगा। सदन से पारित होने के बाद दोनों भाषाएं प्रदेश की दूसरी भाषाओं के साथ आधिकारिक दर्जा हासिल कर लेंगी। इस घोषणा के बाद ऑल जेके सिख संगत ने आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी।
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श्रीनगर स्थित नेशनल कॉन्फ्रेंस के पार्टी मुख्यालय नवा-ए-सुबह में जेकेएनसी माइनॉरिटी सेल (खालसा) की राज्य स्तरीय बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता सांसद शम्मी ओबेरॉय ने की। इसमें मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी भी मौजूद रहे। पूर्व मंत्री मंजीत सिंह, माइनॉरिटी सेल के संयोजक जगदीश सिंह आजाद, जम्मू प्रांतीय युवा अध्यक्ष सरदार तेजिंदर सिंह अमन तथा जिला गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों (डीजीपीसी) के प्रतिनिधियों के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने सरकार के समक्ष अपनी बात रखी।
कश्मीर और जम्मू दोनों संभागों के खालसा नेताओं ने मांग उठाई कि उर्दू, कश्मीरी, डोगरी, हिंदी और अंग्रेजी की तर्ज पर पंजाबी को भी केंद्र शासित प्रदेश की आधिकारिक भाषाओं में शामिल किया जाए।
सांसद ओबेरॉय ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि यह बैठक खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के निर्देश पर खालसा समुदाय की चिंताओं, शिकायतों और मांगों के ठोस निवारण के लिए बुलाई गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनावी घोषणापत्र में भी पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का वादा शामिल है। ओबेरॉय ने लिखित बयान में आश्वासन दिया कि आगामी विधानसभा सत्र (बजट सत्र) में पंजाबी भाषा को आधिकारिक दर्जा देने और इसके क्रियान्वयन से संबंधित विधेयक पेश किया जाएगा।
सभी वर्गों का समान कल्याण हमारी प्राथमिकता : नासिर असलम वानी
मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार हर समुदाय, क्षेत्र और धर्म के लोगों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। सिख समुदाय की समस्याओं और चिंताओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाएगा।
सिख संगत की बड़ी जीत : मंजीत सिंह
पूर्व मंत्री मंजीत सिंह ने इसे सिख संगत की बड़ी जीत बताई। उन्होंने कहा कि हम इसके लिए पूरे प्रदेश से मिले समर्थन के आभारी हैं। इसमें पंजाब, हरियाणा की सिख संगतों ने भी अहम भूमिका निभाई। यह जीत सभी के संघर्षों की है।
जम्मू-कश्मीर की भाषाई संस्कृति के लिए यह जरूरी : टोनी
जम्मू में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे तरनजीत सिंह टोनी ने कहा कि मोर्चा शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से चलाया गया। इसका उद्देश्य पंजाबी भाषा को उचित मान्यता दिलाना और जम्मू-कश्मीर की भाषाई-सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना था।
कड़े संघर्ष के बाद मोर्चे का समापन
पंजाबी भाषा मोर्चा जम्मू में तवी पुल के पास महाराजा हरी सिंह की प्रतिमा स्थल पर 14 दिन से रात-दिन चल रहा था। इस आंदोलन में सिख संगत, नौजवानों, महिलाओं और बुजुर्ग बड़ी संख्या में भाग ले रहे थे। तेज बारिश, आंधी और रात की ठंड की परवाह किए बिना आंदोलनकारी खुले आसमान के नीचे डटे रहे।
इन मांगों पर भी बनी सहमति
महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के लिए भूमि आवंटन।
सिख सलाहकार बोर्ड गठन।
स्कूलों में पांचवीं तक पंजाबी की शिक्षा।
पंजाबी शिक्षकों के रिक्त पदों को भरना।
यहां बोली जाती है गोजरी
जम्मू संभाग: राजोरी, पुंछ, रियासी, डोडा, किश्तवाड़, रामबन, उधमपुर और जम्मू के कुछ इलाकों में।
कश्मीर संभाग: अनंतनाग, कुलगाम, बारामुला, कुपवाड़ा, गांदरबल और अन्य पहाड़ी क्षेत्र।
लद्दाख: कुछ गुज्जर-बकरवाल आबादी वाले क्षेत्रों में।
पंजाबी की पहुंच
जम्मू संभाग: जम्मू शहर और आसपास के क्षेत्र, आरएस पुरा, अखनूर, सांबा, कठुआ।
कश्मीर संभाग: श्रीनगर सहित विभिन्न शहरों और कस्बों में।
पंजाबी केवल सिख समुदाय की भाषा नहीं है। इसे सिख समाज के साथ-साथ हिंदू और मुस्लिम भी बोलते हैं।