हम शिक्षा प्रणाली में सुधार लाएंगे ताकि बच्चों का बचपन खराब न हो
मुख्यमंत्री ने कहा कि हम बच्चों पर उनकी क्षमता से अधिक दबाव डाल रहे हैं। जब मैं कालेज के दाखिले को देखता हूं तो कभी-कभी डर लगता है। इसमें कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों में कट आफ 98 से 100 प्रतिशत तक जा रहा है। मैं पूछना चाहता हूं कि 100 प्रतिशत से अधिक क्या हो सकता है। बदकिस्मती से ऐसे दबाव में हम विद्यार्थियों का बचपन छीन रहे हैं।
कॉलेज, विश्वविद्यालय, सिविल सर्विस की तैयारी में हमारा बचपन निकल जाता है। हमें यह बचपन दोबाना नहीं मिलेगा। हमें निर्धारित वक्त से पहले बच्चों का बचपन नहीं छीनना चाहिए। हमें उन्हें खुलकर जीने देना चाहिए। हम कोशिश करेंगे कि हमारी सरकार शिक्षा प्रणाली में ऐसे सुधार लाए, जिसमें इस दबाव को कम किया जा सके। शिक्षा के साथ हमारे बच्चे तंदुरुस्त रहने के लिए कम से कम दिन में आधा घंटा खेलकूद में दें।
किताबें पढ़ें और दिमाग को संतुलित रखेंउमर ने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। कहा कि टेक्सट बुक के अलावा कोई भी एक किताब पढ़ने की आदत डालें। चाहे वो कोई भी किताब हो। भले ही फिक्शन हो। मुझमें मेरी मां ने यह आदत डाली है। मैं रात को किसी न किसी किताब के जितने भी पन्ने पढ़ने का वक्त मिले पढ़ता हूं। किताब पढ़े बिना मुझे नींद ही नहीं आती। दूसरा किताब पढ़कर सुबह आप तरोताजा उठते हो और आपका पूरा दिन अच्छा निकलता है। इससे मेरे दिमाग में संतुलन बना रहता है।
नशे के खिलाफ काम कर रही सरकार, मगर समाज का सहयोग जरूरी
मुख्यमंत्री ने जम्मू-कश्मीर में युवाओं में बढ़ते नशे के चलन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सरकार नशे के खिलाफ काम कर रही है। इस पर अंकुश लगाने के लिए समाज के सहयोग के साथ बच्चों के भी आगे आने की जरूरत है। जब भी युवाओं की बात होती है तो उसके साथ नशा जुड़ जाता है। आप मेधावी हैं और खुशकिस्मत हैं कि इस दलदल में नहीं फंसे। आपको दूसरों को भी नशे से निकालना है। मैं लोगों से अपील करना चाहता हूं कि अगर आपका कोई साथी या जान पहचान वाला नशे में फंस गया है तो उसके पुनर्वास के लिए काम करें।
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां, हम बुजुर्गों की विरासत को नहीं संभाल पाए, इसे संभालने की आपकी बारीमुख्यमंत्री ने कहा कि जम्मूृ-कश्मीर में जलवायु परिवर्तन साफ महसूस किया जा सकता है। दिसंबर में गुलमर्ग में बर्फ होती थी। वहां जाने की नहीं सोच सकते थे। जम्मू में इतनी ठंड हुआ करती थी कि बिना हीटर बैठ पाना संभव ही नहीं होता था।
आज दिन में स्वैटर भी न पहनें तो कोई ज्यादा तकलीफ नहीं होगी। हम सही मायने में लोगों को जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों के बारे में समझा नहीं पा रहे हैं। हमें अपने बुजुर्गों से बहुत अच्छी कुदरत विरासत में मिली थी, लेकिन हमारी पीढ़ी इसे संभाल नहीं पाई। अब इसे ठीक करने की जिम्मेदारी आपकी है। हमारी उम्र तेजी से निकल रही है। कल आप हमारी जगह होंगे तो कुदरत को न संभाल पाने का ये अफसोस नहीं होना चाहिए। हम आज भी कोशिश करें तो धीरे-धीरे इन परिस्थितियों को ठीक कर सकते हैं। हालांकि सरकार की जिम्मेदारी इसमें अधिक है, मगर जनभागीदारी भी जरूरी है।