जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने कश्मीर में आतंकवाद तथा अलगाववाद पर पहली चोट की। इन दोनों ही मामलों पर उनका रवैया बेहद सख्त था। आतंकवाद के दौर में नब्बे के दशक में घाटी से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का जहर भी उन्हें पीना पड़ा था, लेकिन कश्मीरी पंडितों का मानना है कि उनकी वजह से ही पंडितों की जान बच पाई।
देशभर को मां वैष्णो देवी के प्रसाद के रूप में श्राइन बोर्ड दिया है। श्राइन बोर्ड की वजह से ही देश तथा विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को रहने, खाने-पीने की बेहतरीन सुविधाएं मिल पा रही हैं। जगमोहन कश्मीर में अलगाववाद तथा आतंकवाद पर काफी सख्त रवैया रखते थे। आतंकियों के खिलाफ उन्होंने कई ऑपरेशन चलवाए। जगह-जगह छापामारी अभियान चलाया। इस वजह से आतंकियों में खौफ पैदा हो गया था।
उनके इसी सख्त रवैया की वजह से जनवरी 1990 में उन्हें दोबारा जम्मू-कश्मीर की कमान सौंपी गई। लेकिन वे पांच महीने ही रह सके और वीपी सिंह सरकार से मतभेद के बाद उन्हें बुला लिया गया। हालांकि, सख्ती की वजह से उन्हें कश्मीर आधारित पार्टियों की आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं।
यह भी पढ़ें- जम्मू-कश्मीर शिक्षा बोर्ड: 11वीं के 54 हजार परीक्षार्थियों को बोर्ड के आदेश का इंतजार
आतंकवाद का दौर शुरू होने पर 19 जनवरी 1990 को घाटी से कश्मीरी पंडितों का व्यापक पैमाने पर विस्थापन हुआ। इस दर्द को भी उन्होंने सहा। पंडितों के घर-बार छोड़ने के साथ ही उन्होंने श्रीनगर में 19 जनवरी की रात घर-घर तलाशी अभियान चलवाया। इसमें कई आतंकियों को धर दबोचा गया। इसके विरोध में अगले दिन लोग सड़कों पर आ गए। गवाकदल में प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर सुरक्षा बलों को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें कई लोग मारे गए।