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कश्मीर में आतंकवाद तथा अलगाववाद पर पहली चोट की थी जगमोहन ने

Wed, 05 May 2021 03:55 PM IST
करिश्मा चिब बृजेश कुमार सिंह, जम्मू

सार

कई ऑपरेशन चलाए थे, लगातार छापामारी से आतंकियों में पैदा हो गया था खौफ। दहशतगर्दी के चलते घाटी छोड़ने को मजबूर कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का जहर भी पीया।
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जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने कश्मीर में आतंकवाद तथा अलगाववाद पर पहली चोट की। इन दोनों ही मामलों पर उनका रवैया बेहद सख्त था। आतंकवाद के दौर में नब्बे के दशक में घाटी से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का जहर भी उन्हें पीना पड़ा था, लेकिन कश्मीरी पंडितों का मानना है कि उनकी वजह से ही पंडितों की जान बच पाई।
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देशभर को मां वैष्णो देवी के प्रसाद के रूप में श्राइन बोर्ड दिया है। श्राइन बोर्ड की वजह से ही देश तथा विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को रहने, खाने-पीने की बेहतरीन सुविधाएं मिल पा रही हैं। जगमोहन कश्मीर में अलगाववाद तथा आतंकवाद पर काफी सख्त रवैया रखते थे। आतंकियों के खिलाफ उन्होंने कई ऑपरेशन चलवाए। जगह-जगह छापामारी अभियान चलाया। इस वजह से आतंकियों में खौफ पैदा हो गया था।

उनके इसी सख्त रवैया की वजह से जनवरी 1990 में उन्हें दोबारा जम्मू-कश्मीर की कमान सौंपी गई। लेकिन वे पांच महीने ही रह सके और वीपी सिंह सरकार से मतभेद के बाद उन्हें बुला लिया गया। हालांकि, सख्ती की वजह से उन्हें कश्मीर आधारित पार्टियों की आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं।
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आतंकवाद का दौर शुरू होने पर 19 जनवरी 1990 को घाटी से कश्मीरी पंडितों का व्यापक पैमाने पर विस्थापन हुआ। इस दर्द को भी उन्होंने सहा। पंडितों के घर-बार छोड़ने के साथ ही उन्होंने श्रीनगर में 19 जनवरी की रात घर-घर तलाशी अभियान चलवाया। इसमें कई आतंकियों को धर दबोचा गया। इसके विरोध में अगले दिन लोग सड़कों पर आ गए। गवाकदल में प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर सुरक्षा बलों को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें कई लोग मारे गए।
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कश्मीरी पंडितों का मानना है कि आतंकियों ने पूरे समुदाय के सामूहिक नरसंहार की साजिश रची थी। व्यापक पैमाने पर हत्याएं तथा महिलाओं के साथ दुष्कर्म हो रहे थे। ऐसे में जगमोहन ने सख्त रवैया अपनाकर उनका जीवन सुरक्षित किया। कश्मीरी पंडितों की संस्था पनुन कश्मीर के वीरेंद्र रैना का कहना है कि उन्होंने कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बचाया। अलगाववादी तथा आतंकी शक्तियों के खिलाफ उन्होंने सख्ती की, जिसकी वजह से सामूहिक नरसंहार से पंडित समुदाय बच सका। वे प्रखर राष्ट्रवादी थे तथा पंडितों के जीवन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मां वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का प्रसाद जगमोहन ने देश को दिया
जगमोहन दो बार जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल रहे। 1984 से 1989 तक उन्होंने पहला कार्यकाल पांच साल का पूरा किया। इसके बाद जनवरी से मई 1990 तक उन्होंने इस पद की जिम्मेदारी निभाई। मां वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का गठन उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में 1986 में किया। बारीदारों के नियंत्रण में रहने वाले मंदिर को सरकारी नियंत्रण में लाया। इसके साथ ही चढ़ावे के रूप में मिलने वाले पैसे तथा अन्य संपत्तियों का इस्तेमाल यात्री सुविधाओं के विकास में किया।

इसमें यात्रा ट्रैक का दोहरीकरण, यात्रियों के ठहरने, ट्रैक पर लोगों के लिए खाने-पीने व स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित कीं। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधाओं के साथ मां के दरबार तक पहुंचने का सुगम रास्ता उन्होंने प्रशस्त किया। मां वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के सीईओ रमेश कुमार का कहना है कि जगमोहन ने पहले चेयरमैन के रूप में मां वैष्णो देवी के दरबार में श्रद्धालु केंद्रित सुविधाओं का विकास कर अधिक से अधिक संख्या में आम लोगों के पहुंचने का मार्ग प्रशस्त किया। आज जो भी सुविधाएं यहां श्रद्धालुओं को मिल रही हैं उन सबकी नींव उनके कार्यकाल में ही रखी गई। 
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