जम्मू के जगती टाउनशिप कॉलोनी में रह रहे कश्मीरी पंडितों की नई पीढ़ी विदेश में है। उनके बच्चे अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया समेत अन्य देशों में नौकरी कर रहे हैं। कुछ जम्मू और कश्मीर में सरकारी नौकरी में हैं, बड़े पदों पर भी हैं। कॉलोनी में रह रहे बुजुर्ग कहते हैं कि हम क्यों नहीं लौटेंगे कश्मीर, बिल्कुल चले जाएंगे। वह हमारी जन्मभूमि, मातृभूमि है। मगर वापस जाने की शर्तें हमारी होंगी। दिल्ली, मुंबई में कश्मीरी पंडितों के नाम से चलने वाली संस्थाएं इस बात का फैसला नहीं करेंगी कि हम लोग कब और कैसे जाएंगे। यह फैसला तो यहां रहने वाले 4250 परिवार ही करेंगे।
पंडितों का एक दर्द यह भी है कि मुंबई, दिल्ली समेत देश के कुछ और हिस्सों में कश्मीरी पंडितों के नाम से संस्थाएं चल रही हैं। वह हमारे वापस लौटने की मांग करते हैं, सरकारों से बात करते हैं। समझ नहीं आता कि इन संस्थाओं के लोग कौन हैं। यह कभी विस्थापित तो रहे नहीं। इनमें से कभी कोई हमारी कॉलोनी में भी नहीं आया। न यहां की दिक्कतों को समझा। हमारे संघर्ष, मौजूदा हालात और मनोस्थिति को भी नहीं समझते हैं फिर ये कौन होते हैं हमारे बारे में फैसला लेने वाले। 64 वर्षीय चमनलाल पंडित कहते हैं कि सरकार अपना एक नुमाइंदा हमारे बीच भेजे। कॉलोनी के लोगों से बात करे, हमारी शर्तेें सुने और हम चले जाएंगे वापस कश्मीर। वह बताते हैं कि देश में कश्मीरी पंडितों की सबसे बड़ी कॉलोनी यही है और यही दुर्दशा की भी शिकार है।