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कश्मीर पर केंद्र के राजनीतिक रुख ने IB की नींद उड़ाई

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह को रविवार रात में ही कट्टर अलगाववादी मसर्रत आलम की रिहाई संबंधी जम्मू-कश्मीर प्रशासन के दो महीने पुराने फैसले के बारे में बता दिया गया था।
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शीर्ष नेतृत्व को मिली पूरी जानकारी के बाद खुफिया ब्यूरो को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उसे संभाल लेगी, लेकिन सोमवार को विपक्ष के दबाव में मोदी और राजनाथ के संसद में दिए कड़े राजनीतिक बयान ने एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। आईबी की चिंता है कि इस तनातनी में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूट ना जाए।

कानूनी तकनीकी पहलुओं पर विपक्ष को मनाने के उपाय के उलट केंद्र सरकार के अख्तियार किए गए कड़े रुख से असहज आईबी ने सोमवार देर शाम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से इस मुद्दे को राजनीतिक तूल नहीं देने की गुजारिश की।
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एजेंसी ने केंद्र को चेताया है कि फिलहाल राज्य में सरकार गठन का यह एक मात्र विकल्प है। अगर गठबंधन टूटता है तो घाटी में हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। पाकिस्तान के साथ शुरू हुई बातचीत और घाटी में अलगाववादियों के साथ बन रहे संतुलन को गहरा झटका पहुंचेगा।
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केंद्र सरकार के कड़े बयान से खुफिया एजेंसियां चिंतित

एजेंसी के उच्चपदस्थ सूत्र ने अमर उजाला को बताया कि मसर्रत की रिहाई में मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का कोई हाथ नहीं। यह फैसला चार फरवरी को राज्यपाल के शासन में ही ले लिया गया था। जम्मू के जिलाधिकारी ने एसएसपी को सईद के शपथ ग्रहण के एक हफ्ते बाद फैसले पर अमल करने की चिट्ठी भेज दी।

लेकिन, दिल्ली में हो रहे हंगामे के बावजूद सईद ने सच बताने की बजाए वहां के अलगाववादी समर्थकों के बीच नरमी का संदेश देकर राजनीतिक चाल चल दी। सईद की बेटी और सांसद महबूबा मुफ्ती ने खुलेआम कहा कि पार्टी चुनावी वायदे पूरी करेगी। उन्हें इस गठबंधन की परवाह नहीं।

आईबी के मुताबिक जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही मसर्रत को जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत बार-बार गिरफ्तार किए जाने के प्रति सरकार को आगाह कर चुका है।

अगर मसर्रत को फिर इस कानून के तहत गिरफ्तार किया जाता है कि वह सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाएगा और सरकार के लिए इससे जायज ठहराना आसान नहीं होगा। क्योंकि चार साल की गिरफ्तारियों में पुलिस एक बार भी अपना पक्ष साबित नहीं कर पाई है।
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